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उपन्यास >> पथ के दावेदार

पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710
आईएसबीएन :9781613014288

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


अपूर्व ने कहा, “आज भयंकर कांड हो गया डॉक्टर साहब! हमारे एकाउटेंट तलवलकर बाबू को पुलिस पकड़कर ले गई।”

भारती बोली, “इनसिन में उनका घर है। वहीं उनकी पत्नी है, बेटी है। अभी तक उन्हें समाचर तक नहीं मिला।”

अपूर्व ने कहा, “यह कैसी भयानक आपत्ति आ पड़ी डॉक्टर साहब....”

डॉक्टर हंसकर बोला, “भारती, मैं बहुत ही थका हुआ हूं। मुझे चाय बनाकर पिला सकती हो बहिन?”

“क्यों नहीं? लेकिन हम लोगों को बाहर जाना है।”

“कहां?”

“इनसिन। तलवलकर बाबू के घर।”

“कोई जरूरत नहीं।”

अपूर्व ने आश्चर्य से कहा, “जरूरत कैसे नहीं डॉक्टर साहब?”

डॉक्टर हंसकर बोले, “लेकिन इसका भार तो मेरे ऊपर है। आप बैठिए। जब तक भारती चाय बनाकर लाए, होटल का ब्राह्मण रसोइया पवित्रता के साथ खाने की कुछ चीज तैयार करके दे जाए। खा-पीकर आप आराम कीजिए।”

अपूर्व बोला, “इस रात को तो कष्ट उठाने से तुम बच गईं भारती, लेकिन मेरी जिम्मेदारी.... कैसी ही रात क्यों न हो, गए बिना पूरी नहीं होगी।”

भारती ठिठककर खड़ी हो गई। लेकिन तभी डॉक्टर के मुंह की ओर देखकर वह फिर अपना काम करने के लिए चली गई।

डॉक्टर साहब मोमबत्ती जलाकर पत्र लिखने लगे।

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