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उपन्यास >> पथ के दावेदार

पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710
आईएसबीएन :9781613014288

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


भारती ने धीरे-धीरे कहा, तुम खयाल मत करना भैया। मैं हमेशा से देख रही हूं, गांव के प्रति तुम्हारी सहानुभूति कम है। तुम्हारी नजर केवल शहरों पर ही टिकी रहती है। किसान के प्रति तुम सहृदय नहीं हो। तुम्हारी आंखें केवल कारखानों के मजदूरों पर लगी रहती हैं। इसीलिए तुमने पथ के दावेदार की इन्हीं लोगों के बीच स्थापना की थी। वह ही लोग तुम्हारी आशा हैं, वह ही तुम्हारे अपने हैं। झूठी बात तो नहीं है?

डॉक्टर ने कहा, झूठ नहीं है बहिन, बिल्कुल सच है। कई बार तो मैं तुमसे कह चुका हूं 'पथ के दावेदार' किसानों के हितकारिणी संस्था नहीं है। वह मेरी स्वाधीनता प्राप्त करने का अस्त्र है। मजदूर और किसान एक नहीं हैं भारती। इसीलिए तुम मुझे मजदूरों के बीच, कारखानों के बैरेक में पाओगी। लेकिन मुझे गांवों में किसानों की झोंपड़ी में नहीं पाओगी-लेकिन बातों-ही-बातों में पड़ी रहकर अपना श्रेष्ठकर्त्तव्य मत भूल जाना बहिन! ....फिर स्टोव की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए बोले, देशोद्धार तो दो दिन बाद होने पर सह लिया जाएगा। लेकिन तैयार खिचड़ी जल गई तो यह दु:ख सहन नहीं होगा।

भारती झटपट दौड़ती हुई गई और हांडी का ढक्कन हटाकर देख लेने के बाद हंसती हुई बोली, डरने की बात नहीं है भैया। आज रात का तुम्हारा खिचड़ी भोग मारा नहीं जाएगा।

लेकिन देर कितनी है?

बस पंद्रह-बीस मिनट....लेकिन इतनी जल्दी क्यों?

डॉक्टर ने हंसकर कहा, आज तुम लोगों से विदा लेने आया हूं। बात चाहे जैसी ही क्यों न हो?

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