श्रीकान्त - शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय Shrikant - Hindi book by - Sharat Chandra Chattopadhyay
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उपन्यास >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास

शरत् चन्द्र की प्रतिभा स्त्रियों की यन्त्रणा के चित्रण में अपने शिखर पर पहुँची। उनका लगभग हर उपन्यास किसी-न-किसी रूप में स्त्रियों के जीवन की विडम्बनाओं के इर्द-गिर्द बुना हुआ है। ‘श्रीकान्त’ का नायक एक घुमक्कड़ है लेकिन उसकी इस यात्रा में उपन्यास कई ऐसी महिलाओं को हमारे सामने लाता है जिनके माध्यम से हम तत्कालीन समाज और व्यक्ति, पवित्रता और पाप की अवधारणाओं और विद्रोह और स्वीकृति जैसे शाश्वत द्वन्द्वों के अन्तर्संघर्ष को समझने की दिशा में सोचना शुरु करते हैं। इस उपन्यास में आईं राजलक्ष्मी, अन्नदा दीदी और सुनन्दा जैसे स्त्री पात्र आज भी हमें अपने आसपास के ही चरित्र लगते हैं। इनके जीवन और उसकी परिस्थितियों के द्वारा आज भी औरत के उस दुख को जाना जा सकता है जिसमें आज भी कोई बहुत ज्यादा कमी नहीं आई है।

श्रीकान्त

1

अपने इस खानाबदोश-से जीवन की ढलती हुई बेला में खड़े होकर इसी का अध्याय जब कहने बैठा हूँ तो जाने कितनी बातें याद आती हैं।

यों घूमते-फिरते ही तो मैं बच्चे से बूढ़ा हुआ हूँ। अपने-पराए सभी के मुँह से अपने सम्बन्ध में केवल 'छि:-छि:' सुनते-सुनते मैं अपनी जिन्दगी को एक बड़ी भारी 'छि:-छि:' के सिवाय और कुछ भी नहीं समझ सका। किन्तु बहुत काल के बाद जब आज मैं कुछ याद और कुछ भूली हुई कहानी की माला गूँथने बैठा हूँ और सोचता हूँ कि जीवन के उस प्रभात में ही क्यों उस सुदीर्घ 'छि:-छि:' की भूमिका अंकित हो गयी थी, तब हठात् यह सन्देह होने लगता है कि सब लोग इस 'छि: छि:' को जितनी बड़ी बनाकर देखते थे उतनी बड़ी शायद वह नहीं थी। जान पड़ता है, भगवान जिसे अपनी सृष्टि के ठीक बीच में जबरन धकेल देते हैं शायद उसे भला लड़का कहलाकर एग्जाम पास करने की सुविधा नहीं देते; और न वे उसे गाड़ी-घोड़े पालकी पर लाव-लश्कर के साथ भ्रमण करके 'कहानी' नाम देकर छपाने की ही अभिरुचि देते हैं। उसे बुद्धि तो शायद, वे कुछ दे देते हैं, परन्तु दुनियादार लोग उसे 'सु-बुद्धि' नहीं कहते। इसी कारण उसकी प्रवृत्ति ऐसी असंगत, ऐसी निराली होती है, और उसके देखने की चीजें, और जानने की तृष्णा, स्वभावत: ऐसी बेजोड़ होती हैं कि यदि उसका वर्णन किया जाए तो, शायद, 'सु-बुद्धि' वाले हँसते-हँसते मर जाँय। उसके बाद वह मन्द बालक; न जाने किस तरह, अनादर और अवहेलना के कारण, बुरों के आकर्षण से और भी बुरा होकर, धक्के और ठोकरें खाता हुआ, अज्ञात-रूप से अन्त में किसी दिन अपयश की झोली कन्धों पर रखकर कहीं चल देता है, और बहुत समय तक उसका कोई पता नहीं लगता।

आगे....


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