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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“नहीं तो...?”
“नहीं तो फिर क्या! तुम्हारे लायक लड़की जब ढूँढ़ दूँगी, उसी समय इस बात का उत्तर दूँगी, इस समय नहीं।”
सिर हिलाकर मैंने कहा, “तुम फिजूल कोशिश मत करो राजलक्ष्मी, मेरे लायक लड़की तुम किसी दिन भी खोजकर न निकाल सकोगी।”
वह बहुत देर तक चुप बैठी रहकर एकाएक बोल उठी, “अच्छा सो शायद न निकाल सकूँ, परन्तु तुम बर्मा जाओगे तो मुझे साथ ले चलोगे?”
उसके प्रस्ताव को सुनकर मैं हँसा। बोला, “मेरे साथ चलने का तुम्हें साहस होगा?”
प्यारी मेरे मुँह के प्रति तीक्ष्ण दृष्टि पात करके बोली, “साहस! इसे क्या तुम कोई बड़ा कठिन काम समझते हो?”
“मैं चाहे जो समझूँ, किन्तु तुम्हारे इस सारे घर-द्वार, माल-असबाब, जमीन-जायदाद आदि का क्या होगा?”
प्यारी बोली, “चाहे जो हो। तुम्हें नौकरी करने के लिए जब इतनी दूर जाना पड़ा- यह सब रहते हुए भी जब तुम्हारे किसी काम न आया, तब इसे बंकू को दे जाऊँगी।”
इस बात का जवाब मैं नहीं दे सका। खुली हुई खिड़की के बाहर अंधेरे में देखता हुआ चुपचाप बैठा रहा।
उसने फिर कहा, “इतनी दूर न जाओ तो न चले? यह सब क्या किसी भी दिन तुम्हारे किसी काम में नहीं आ सकता?”
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