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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
समाज को उसने क्यों इतना बड़ा अभिशाप दिया सो वह जाने और उसके अन्तर्यामी जानें। मैं नहीं जानता, सो बात नहीं है; किन्तु मैं चुप ही रहा। बूढ़ा दरबान गाड़ी का दरवाजा खोलकर मेरे मुँह की ओर देखने लगा। मैं आगे पैर बढ़ा ही रहा था कि प्यारी आँखों के आँसुओं में से मेरे मुँह की ओर देखकर कुछ हँसी; बोली, “कहाँ जा रहे जो? फिर तो शायद दर्शन होंगे नहीं, एक भिक्षा देते जाओगे?”
मैं बोला, “दूँगा, कहो।”
प्यारी बोली, “भगवान न करें-किन्तु, तुम्हारी जीवन-यात्रा जिस ढंग की है उससे-अच्छा, जहाँ भी रहो, ऐसे समय में खबर दोगे? शरमाओगे तो नहीं?”
“नहीं, शरमाऊँगा नहीं-खबर जरूर दूँगा” इतना कहकर धीरे-धीरे मैं गाड़ी में जा बैठा । प्यारी पीछे-पीछे आई और उसने अपने आँचल में मेरे पैरों की धूल ले ली।
“अजी सुनते हो?” मैंने मुँह उठाकर देखा कि वह अपने काँपते हुए होठों को प्राणपण से काबू में रखकर कहने की कोशिश कर रही है। दोनों की नजर एक होते ही फिर उसकी आँखों से झर-झर पानी झर पड़ा। वह अस्पष्ट रुँधे हुए कण्ठ से धीरे से बोली, “न जाओ इतनी दूर तो? रहने दो, मत जाओ...”
चुपके से मैंने अपनी नजर उस ओर से फेर ली। गाड़ीवान ने गाड़ी हाँक दी। चाबुक और चार-चकोंके सम्मिलित सपासप और घर-घर शब्द से शाम का समय मुखरित हो उठा। किन्तु, इस सबको दबाकर केवल एक रुँधे हुए कण्ठ का दबा हुआ रुदन ही मेरे कानों में गूँजने लगा।
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