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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
मुझे जहाँ तक याद आता है, मेरी नीचे जाने की इच्छा नहीं थी। पैरों से चलकर भी नहीं उतरा। क्षण भर के लिए मैं बेहोश हो गया था, इसलिए, मेरे इस कथन में यदि कोई सन्देह प्रकट करे, तो शायद कसम खाकर मैं इसे अस्वीकार भी न कर सकूँगा। होश में आने पर देखा कि गर्भ-गृह के मध्यक बहुत दूर पर एक कोने में मैं अकेला खड़ा हूँ। पैरों की ओर निगाह दौड़ाई, तो देखता हूँ कि इसी बीच में, जादू के खेल की तरह पल-भर में ही कम्बल बिछाकर और बॉक्स-पिटारों आदि से घेरकर हर किसी ने अपने-अपने लिए निरापद-स्थान बना लिया है और शान्ति से बैठकर अपने पड़ोसी का परिचय प्राप्त करना शुरू कर दिया है। इतनी देर के बाद, अब कहीं मेरे उस नम्बर वाले कुली ने आकर दर्शन दिया और कहा, “ट्रंक और बिस्तर ऊपर रख आया हूँ, यदि आप कहें तो नीचे ले आऊँ।”
मैंने कहा, “नहीं, बल्कि, किसी तरह यहाँ से उद्धार करके मुझे ही ऊपर ले चल।” क्योंकि वहाँ इतना-सा स्थान भी मुझे कहीं खाली दिखाई नहीं दिया कि दूसरों के बिस्तर खूँदे बगैर तथा उनके साथ हाथापाई की सम्भावना उत्पन्न किये बगैर, मैं कहीं अपना कदम रख सकूँ। वर्षा होने पर ऊपर पानी में भीग जाऊँ यह अच्छा, किन्तु यहाँ एक क्षण-भर भी ठहरना ठीक नहीं। अधिक पैसों के लोभ से कुली, काफी कोशिश और बहस-मुबाहिसे के बाद, कम्बलों और सतरंजियों के किनारों को उलटता-पुलटता हुआ मुझे अपने साथ लिये हुए ऊपर आया और मेरा माल-असबाब दिखाकर बख्शीश लेकर चलता बना। यहाँ का भी वही हाल- बिस्तर बिछाने के लिए, निरुपाय हो अपने ट्रंक के ऊपर ही बैठने का इन्तजाम करके मैं एकाग्र चित्त से माता भागीरथी के दोनों किनारों की महिमा का निरीक्षण करने लगा।
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