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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
मैंने नजर उठाकर देखा, कुछ ऊँचे पीपों की आड़ में खड़े होकर वे खींसे बाहर निकाल कर हँस रहे हैं और शरीर की धूल झाड़ रहे हैं। साहब थोड़ा-सा हँसकर, डॉक्टर बाबू के मुँह पर दोनों हाथों के अंगूठे हिलाकर दाएँ-बाएँ झूमता सीटी देता हुआ चल दिया। विजय का गर्व जैसे उसके सारे शरीर से फूट पड़ने लगा।
डॉक्टर बाबू का मुँह लज्जा से, क्षोभ से और अपमान से काला हो गया। तेजी से कदम आगे रखते हुए क्रुद्ध स्वर से वे बोल उठे, “बेहया सालो, खींसे बाहर निकालकर हँस रहे हो!”
इस दफे, इतनी देर बाद, देशी लोगों का आत्म सम्मान शायद लौट आया। सब लोगों ने एक साथ हँसना बन्द करके तेजी से जवाब दिया, “तुम डॉक्टर बाबू, 'साला' कहने वाले कौन होते हो? किसी का कर्ज खाकर तो हम लोग नहीं हँसते?”
“जबर्दस्ती से डॉक्टर बाबू को खींचकर उनके कमरे में वापिस ले आया। कुर्सी पर धम्म से गिरते हुए उनके मुँह से सिर्फ 'ऊ:-!' निकला।
और कोई दूसरी बात उनके मुँह से बाहर निकलना भी असम्भव थी। ग्यारह बजे के लगभग कॉरेण्टाइन के पास एक छोटा-सा स्टीमर आकर जहाज से सटकर खड़ा हो गया। समस्त डेक के यात्रियों को यही उस भयानक स्थान में ले जाएगा। माल-असबाब बाँधने-छोरने की धूम मच गयी। मुझे जल्दी नहीं थी; क्योंकि, डॉक्टर बाबू का आदमी अभी ही कह गया था कि मुझे वहाँ नहीं जाना पड़ेगा। निश्चिंत होकर यात्रियों और खलासियों की चिल्लाहट और दौड़-धूप कुछ अन्यमनस्क-सा होकर देख रहा था। हठात् पीछे से एक शब्द सुन पड़ा, पलटकर देखा कि अभया खड़ी है। आश्चर्य के साथ पूछा, “आप यहाँ कैसे?”
अभया बोली, “क्यों, क्या आप अपनी चीज-बस्त बाँधोगे नहीं?”
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