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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
सहसा उनकी दृष्टि अभया और रोहिणी पर जा पड़ी। वे मुसकराते हुए बोले, “तब मुझे बेकार ही कष्ट दिया?”
“उसके लिए क्षमा चाहता हूँ।”
“नहीं नहीं, उसकी जरूरत नहीं, मैं पहले से ही जानता था, गुड बाई।” यह कहकर डॉक्टर बाबू हँसते चेहरे से चले गये।
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'कॉरंटाइन' नामक जेलखाने में भेजने का कानून केवल 'कुलियों' के लिए है- शरीफों के लिए नहीं; और जो जहाज का किराया दस रुपये से अधिक नहीं देता वही 'कुली' है। चाय के बगीचों का कायदा क्या कहता है सो नहीं मालूम; पर जहाजी कानून तो यही है। और अधिकारी या अफसर प्रत्यक्ष ज्ञान से क्या जानते हैं, यह तो वे ही जानें; किन्तु ऑफिशियल इससे अधिक जानने की रीति नहीं है। इसलिए, इस यात्रा में हम सब 'कुली' थे। और, साहब लोग यह भी समझते हैं कि कुली की जीवन-यात्रा के लिए माल-असबाब ऐसा कुछ अधिक नहीं हो सकता- और न होना उचित ही है, कि जिसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक कन्धों पर रखकर वह न ले जा सकता हो। इसलिए, उतरने के घाट पर केरिण्टिन-यात्रियों का माल-असबाब ले जाने के लिए यदि कोई व्यवस्था नहीं है तो इसके लिए क्षुब्ध होने का कोई कारण नहीं। यह सब सच है; फिर भी, यह केवल हमारे ही भाग्य का दोष समझिए कि हम तीन प्राणी, सिर के ऊपर प्रचण्ड सूर्य और पैरों के नीचे उससे भी अधिक उग्र बालुका-राशि से जलते हुए, एक अपरिचित नदी के किनारे बड़े-बड़े गट्ठर सामने रखकर किंकर्तव्यविमूढ़ भाव से एक दूसरे का मुँह देखते खड़े हुए हैं। साथ के यात्रियों का परिचय पहले ही दे चुका हूँ। वे लोग अपने लोटे-कम्बल पीठ पर रखकर, और अपेक्षाकृत अधिक बोझ अपनी गृहलक्ष्मियों के सिर पर लादकर, मजे से गन्तव्य स्थान पर चले गये।
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