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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
आखिर, गट्ठर-गठरियों की ममता छोड़कर मैं रोहिणी भइया को पीठ पर लादकर केरिण्टिन की ओर रवाना हुआ। अभया ने केवल एक छोटा-सा हाथ-बॉक्स लेकर मेरा अनुसरण किया और समान वहाँ ही पड़ा रहा। अवश्य ही वह सब खोया नहीं गया- कोई दो घण्टे बाद उसे ले आने का प्रबन्ध हो गया।
अधिकांश स्थानों में देखा जाता है कि सचमुच की विपत्ति काल्पनिक विपत्ति की अपेक्षा अधिक सहज और सह्य होती है। पहिले से ही इस बात का खयाल रखने से अनेक दुश्चिन्ताओं के हाथ से छुटकारा मिल सकता है। इसलिए, यद्यपि कुछ-कुछ क्लेश और असुविधाएँ निश्चय से मुझे भोगनी पड़ीं, फिर भी, यह बात तो स्वीकार करनी ही पड़ती है कि हम लोगों के केरिण्टिन की मियाद के दिन एक तरह से आराम से ही कट गये। इसके सिवाय, पैसा खर्च कर सकने पर यमराज के घर भी जब ससुराल जैसा आदर प्राप्त किया जा सकता है, तब तो यह केरिण्टिन ही थी!
जहाज के डॉक्टर बाबू ने कहा था कि स्त्री खूब 'फारवर्ड' है, किन्तु, जरूरत के समय यह स्त्री कहाँ तक 'फारवर्ड' हो सकती है, इसकी शायद उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी। रोहिणी बाबू को जब पीठ पर से मैंने उतार दिया तब अभया बोली, “बस, अब आपको और कुछ भी नहीं करना होगा श्रीकान्त बाबू, आप विश्राम करें, और जो कुछ करने का है मैं कर लूँगी।”
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