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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
मैंने देखा, अनजान में ही मैंने इस आदमी के ऐसी जगह पर चोट पहुँचा दी है जिसकी मीमांसा होना कठिन है। इसलिए, चट से मैंने रुकावट डालकर कहा, “फिर, नन्द नाम के किसी भी आदमी को आप नहीं जानते?”
“यह आपने खूब कहा! चालीस वर्ष से रंगून में रह रहा हूँ, मैं जानता किसे नहीं? नन्द क्या एक है? तीन-तीन नन्द हैं! आपने नन्द मिस्तरी कहा न? कहाँ से आ रहे हैं आप? शायद बंगाल से, न? ओह, तब कहो न कि टगर के मर्द को पूछ रहे हैं?”
मैंने सिर हिलाकर कहा, “हाँ, हाँ, जरूर वही!”
वह बोला, “तो फिर यह कहिए। परिचय पाए बगैर पहिचानूँ कैसे? आइए मेरे साथ तकदीर के जोर से नन्द कमा खा रहा है महाशय, नहीं तो नन्द पागड़ी भी क्या कोई मिस्तरी है? महाशय, आप कौन हैं?”
यह सुनकर कि मैं ब्राह्मण हूँ, उस आदमी ने रास्ते पर ही झुककर मुझे प्रणाम किया। बोला, “वह आपकी नौकरी लगा देगा? साहब से कहकर आपकी तजबीज लगवा सकता है जरूर; किन्तु, दो महीने की तनख्वाह उसे पहले ही घूँस में देनी होगी। दे सकेंगे क्या? दे सकें तो अठारह-बीस आने रोज की नौकरी लगा सकता है। इससे अधिक की नहीं।”
मैंने उसे बताया कि फिलहाल तो मैं नौकरी की उम्मेदवारी में नहीं जा रहा हूँ- थोड़े से आश्रय की तजवीज की गरज से ही बाहर निकला हूँ, और, इसकी आशा नन्द मिस्री ने जहाज पर दिलाई थी।
यह सुनकर हरिपद मिस्री ने आश्चर्य से पूछा, “महाशय, आप भले आदमी हैं, तो फिर, भले आदमियों के 'मेस' में क्यों नहीं जाते?” मैंने कहा, “मेस कहाँ है, सो तो जानता ही नहीं।”
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