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उपन्यास >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


दादा ठाकुर ने आकर यत्नपूर्वक मेरा स्वागत किया और एक छोटा-सा कमरा दिखाकर कहा, “जितने दिन आपकी इच्छा हो इस कमरे में रहें और हमारे यहाँ भोजन करें। नौकरी-चाकरी लगने की बाद दाम चुका देना।”

मैंने कहा, “मुझे तो आप पहिचानते नहीं हैं, एक महीने रहकर और खा-पीकर बिना दाम दिये भी तो चला जा सकता हूँ।”

दादा ठाकुर ने अपना कपाल दिखाते हुए हँसकर कहा, “इसे तो आप साथ में ले नहीं जा सकते महाशय!”

मैंने कहा, “जी नहीं, उस पर मुझे जरा भी लोभ नहीं है।”

दादा ठाकुर सिर हिलाते-हिलाते इस दफे परम गम्भीर भाव बनाकर बोले, “देखिए, तकदीर भी है महाशय! इसके सिवाय और कोई रास्ता ही नहीं, यही मैं सब लोगों से कहा करता हूँ।”

वास्तव में केवल उनका जबानी जमाखर्च नहीं था। इस सत्य पर वे स्वयं किस कदर अकपट रूप से विश्वास करते थे यह हाथों-हाथ प्रमाणित करने के लिए चार-पाँच महीने के बाद, एक दिन वे प्रात:काल बहुतों की धरोहर-रुपये-पैसे अंगूठी, घड़ी इत्यादि साथ लेकर केवल उनके निराट कपालों को बर्मा में उस शून्य होटल के भेज पर जोर से पटकने के लिए छोड़कर अपने देश चले गये।

जो भी हो, उस समय दादा ठाकुर की बात सुनने में बुरी नहीं लगी और मैं भी उनका एक नया मुवक्किल बनकर एक टूटा-सा कमरा दखल करके बैठ गया। रात को एक कच्ची उम्र की बंगालिन दासी मेरे कमरे में आसन बिछाकर भोजन के लिए जगह करने आई; पास में ही डायनिंग रूम में से लोगों के भोजन का शोर सुनाई दे रहा था। मैंने पूछा, “मुझे भी वहाँ ही न कराके यहाँ भोजन कराने क्यों लाई?”

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