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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
उसकी बात पूरी भी न होने पाई थी कि रोहिणी भइया करीब-करीब चीत्कार कर उठे, “सुनिए श्रीकान्त बाबू, दो रोटी पका देने के लिए- ये बातें आप जरा सुन रखिए। अच्छा, आज से कभी तुमने यदि मेरे लिए रसोईघर में पैर रखा तो तुम्हें बहुत ही बड़ी- बल्कि मैं होटल में-” कहते-कहते उनका गला रुलाई से भर आया, वे धोती का छोर मुँह पर लगाकर तेजी से कदम रखते हुए मकान के बाहर हो गये। अभया ने अपना उतरा हुआ चेहरा नीचे झुका लिया- न जाने आँखों के आँसू छिपाने के लिए या यों ही; किन्तु मैं तो एकदम काठ हो गया। कुछ दिनों से दोनों के बीच अनबन हो रही है, यह तो आँखों से ही देख लिया; किन्तु, इसका गहरा हेतु दृष्टि से बिल्कुल परे होने पर भी वह क्षुधा और भोजन बनाने की त्रुटि से बहुत-बहुत दूर है, यह समझने में मुझे जरा-सा भी विलम्ब नहीं लगा। तो फिर, क्या पति खोजने की बात भी-
मैं उठकर खड़ा हो गया। इस नीरवता को भंग करने में मुझे खुद भी जैसे संकोच होने लगा। कुछ इधर-उधर करके अन्त में मैंने कहा, “मुझे बहुत दूर जाना है- इस समय तो अब चलता हूँ।”
अभया ने मुँह ऊपर उठाकर कहा, “अब कब आइएगा?”
“बहुत दूर!”
“तो फिर जरा ठहर जाइए” कहकर अभया बाहर चली गयी। पाँच-छह मिनट बाद लौटकर आई और मेरे हाथ में एक टुकड़ा कागज देकर बोली, “जिस काम के लिए मैं आई हूँ वह सब इसमें लिख दिया है। पढ़कर जो नीक जँचे सो कीजिएगा। मैं आपसे कुछ अधिक कहना नहीं चाहती।” इतना कहकर गले में आँचल डालकर आज उसने मुझे प्रणाम किया और फिर उठकर पूछा, “आपका ठिकाना क्या है?”
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