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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
गाड़ीवान का एक दफे और बुलाना था कि मैं क्षण-भर भी विलम्ब किये बगैर उठ खड़ा हुआ और बोला, “मैं शीघ्र ही और एक दिन आऊँगा।” इतना कहकर मैं तेजी से बाहर हो गया। अभया और कुछ न बोली। निश्चल मूर्ति की तरह जमीन की ओर देखती रह गयी।
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गाड़ी में बैठते ही गाड़ी चल दी; दस हाथ भी नहीं गया था कि याद आया, छड़ी तो कहीं भूल आया हूँ। तुरन्त गाड़ी खड़ी की और मकान में प्रवेश करते ही देखा कि ठीक दरवाजे के सामने अभया उलटी पड़ी है और बाण से विधे हुए पशु की तरह अव्यक्त वेदना से पछाड़ खाकर मानो प्राण विसर्जन कर रही है।
क्या कहकर उसे सांत्वना दूँ, सो मेरी बुद्धि के परे की वस्तु थी। वज्राहत की तरह कुछ देर सन्न रहकर उसी तरह चुपचाप लौट आया! अभया जिस तरह रो रही थी उसी तरह रोती रही। उसे यह मालूम ही न हो सका कि उसकी इस निगूढ़ असीम वेदना का एक मौन साक्षी भी इस जगत में विद्यमान है।
राजलक्ष्मी का अनुरोध मैं भूला नहीं था। पटने को पत्र लिखने की बात, जब आया था तभी से, मेरे मन में थी। किन्तु, पहली बात तो यह कि संसार में जितने भी कठिन काम हैं, उनमें चिट्ठी लिखने को मैं किसी से भी कम नहीं समझता। इसके सिवाय, फिर लिखूँ भी क्या? किन्तु, अभया का रोना मेरे दिल में इस तरह भारी हो उठा कि उसमें का कुछ अंश बाहर निकाल दिये बगैर मेरी गति ही नहीं है, ऐसा मालूम होने लगा। इसीलिए, डेरे पर पहुँचते ही कागज-कलम जुटाकर बाईजी को पत्र लिखने बैठ गया। और उसको छोड़कर मेरे दु:ख का अंश बँटाने वाला था ही कौन? दो-तीन घण्टे बाद इस 'साहित्य-चर्चा' को समाप्त करके जब मैंने कलम रखी तब रात के बारह बज गये थे। किन्तु, कहीं सुबह दिन के उजालें में उस चिट्ठी को भेजने में लज्जा न आने लगे, इसलिए, मिजाज गर्म रहते-रहते ही मैं उसे उसी समय डाक-बॉक्स में छोड़ आया।
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