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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
बड़े भइया बोले, “अब? राम-राम करके किसी तरह एक दफे जहाज पर चढ़ तो पावें!”
मैंने पूछा, “यह स्त्री को जता दिया है?”
बड़े भइया बोले, “बाप रे! तब क्या हम बच सकेंगे? साली जो जहाँ होंगी रक्त-बीज की तरह आकर घेर लेंगी।” यह कहकर और फिर दोनों आँखें मिचकाकर हँसते हुए बोले, “फ्रेंच लीव्ह महाशय, फ्रेच लीव्ह- आप समझे या नहीं?”
मुझे अत्यन्त क्लेश मालूम हुआ, बोला “ऐसा हुआ तब तो स्त्री को अत्यन्त कष्ट होगा।”
मेरी बात सुनकर बड़े भइया तो हँसी से लोट-पोट हो गये। किसी तरह हँसना बन्द करके बोले, “वाह, आपने भी खूब कहा! इन बर्मी औरतों को कष्ट? इन सालियों की जात के लोग खाकर कुल्ला तक नहीं करते, न इनके यहाँ जूठे-मीठे का विचार है, और न जात-पाँत का। साली सब नेप्पी (एक तरह की सड़ाई हुई मछलियाँ) खाती हैं महाशय, जिसकी दुर्गन्ध के मारे भूतनी-पिशाचियाँ तक भाग जावें। इन सालियों को और कष्ट! एक चला जायेगा तो दूसरे को पकड़ लेंगी-छोटी जात की हैं सालीं-
“ठहरिए महाशय, ठहरिए। आपके भाई को उसने जो इन चार वर्षों तक राजा की तरह खिलाया-पिलाया है, और कुछ न हो, इसके लिए भी तो उसका कुछ कृतज्ञ होना चाहिए।”
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