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उपन्यास >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


रास्ते के किनारे-किनारे जो चलना शुरू किया तो चलता ही गया। बहुत दिन पहले, एक दिन अभया का पत्र पढ़ने जिस चाह की दुकान में गया था उसी दुकान के मालिक ने शायद पहिचान कर मुझे हाँक दी, “बाबू साहब, आइए।”

एकाएक जैसे नींद टूटते ही मैंने देखा, यह वही दुकान है और वह रोहिणी भइया का घर है। बिना कुछ कहे उसके बुलाने का मान रखकर मैं अन्दर चला गया और एक प्याला चाय पीकर बाहर निकला। रोहिणी के दरवाजे पर धक्का देकर देखा कि भीतर से बन्द है। बाहर की साँकल को पकड़कर दो-चार दफे हिलाते ही किवाड़ खुल गये। आँखें उठाकर देखा कि सामने अभया है।

“अरे तुम?”

अभया की आँखें और चेहरा लाल हो उठा; कोई भी जवाब दिए बगैर वह पलक मारते न मारते अपने कमरे में चली गयी और उसने अन्दर से कुण्डी बन्द कर ली। किन्तु, लज्जा की जो मूर्ति शाम के उस धुँधले प्रकाश में उसके चेहरे पर फूट उठते देखी, उससे जानने-पूछने के लिए और कुछ बाकी ही नहीं रहा। अभिभूत की तरह कुछ देर खड़ा रहकर चुपचाप लौटकर जा रहा था कि अकस्मात् मेरे दोनों कानों में मानो दो तरह के विभिन्न रोने के स्वर एक ही साथ गूँज उठे; एक था उस महापापी का और दूसरा उस बर्मी युवती का। मैं जाना ही चाहता था, किन्तु, फिर लौटकर आँगन में खड़ा हो गया। मन ही मन कहा, नहीं, मुझे इस तरह नहीं जाना चाहिए। नहीं-नहीं- ऐसा नहीं करना चाहिए, ऐसा नहीं करना चाहिए, यह उचित नहीं है, यह अच्छा नहीं है- यह सब अनेक दफे सुनने की आदत रही है, अनेक दफे दूसरों को सुनाया भी है-किन्तु बस, अब और नहीं। क्या अच्छा है, क्या बुरा है, क्यों अच्छा है, कहाँ किस तरह बुरा है- ये सब प्रश्न यदि हो सकेगा तो स्वयं उसी के मुँह से सुनूँगा और यदि ऐसा न कर सकूँ, तो केवल पोथी के अक्षरों पर दृष्टि रखकर मीमांसा करने का अधिकार न मुझे है, न तुम्हें है और न शायद विधाता को ही है।

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