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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
अभया बोली, “किन्तु इसके लिए तो समय नहीं था!”
मैंने कहा, “सो हो सकता है। आप जब मुझे देखकर भाग गयीं तब मैं भी चला जा रहा था। किन्तु फिर लौट आया सो क्यों, आप जानती हैं?”
“नहीं।”
“लौट आने का कारण यह है कि आज मेरा मन बहुत ही उद्विग्न हो रहा है। आपसे भी अधिक निष्ठुर अत्याचार मैंने एक स्त्री पर होते हुए आज सुबह देखा है।” यह कहकर जहाज-घाट की उस बर्मी स्त्री की सारी कथा मैंने विस्तार से कह सुनाई और पूछा, “वह स्त्री अब क्या करे, आप बता सकती हैं?”
अभया सिहर उठी, इसके बाद गर्दन हिलाकर बोली, “नहीं, मैं नहीं बता सकती।”
मैंने कहा, “आज आपको और भी दो स्त्रियों का इतिहास सुनाता हूँ। एक तो मेरी अन्नदा जीजी का और दूसरा प्यारी बाई का। दु:ख के इतिहास में इनमें से किसी का भी स्थान आपसे नीचे नहीं है।”
अभया चुप हो रही। शुरू से आखिर तक अन्नदा जीजी की सारी कथा कहकर मैंने आँख उठाकर देखा कि अभया काठ की मूर्ति की तरह स्थिर होकर बैठी है, उसकी दोनों आँखों से पानी झर रहा है। कुछ देर इसी तरह बैठी रहकर उसने जमीन पर सिर लगाकर नमस्कार किया और वह उठकर बैठ गयी। फिर आँचल से आँखों को पोंछते हुए बोली, “उसके बाद?”
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