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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“क्यों नहीं है, कह सकते हैं?”
“नहीं, सो भी नहीं कह सकता। इसके सिवाय आज मेरा मन कुछ ऐसा उद्भ्रान्त हो रहा है कि इन सब जटिल समस्याओं की मीमांसा करना सम्भव ही नहीं। आपके प्रश्न पर मैं और एक दिन विचार करूँगा। फिर भी, आज मैं आपसे यह कहे जा सकता हूँ कि मैंने अपने जीवन में जो थोड़े से महान नारी-चरित्र देखे हैं उन सबने दु:ख के भीतर से गुजरकर ही मेरे मन में ऊँचा स्थान पाया है। मैं शपथपूर्वक कह सकता हूँ कि मेरी अन्नदा जीजी अपने दु:ख का सारा भार चुपचाप सहन करने के सिवाय और कुछ न कर सकतीं। यह भार असह्य होने पर भी वे अपने पथ से हटकर कभी आपके पथ पर पैर रख सकतीं, यह बात सोचने से भी शायद दु:ख के मारे मेरी छाती फट जायेगी।”
कुछ देर चुप रहकर कहा, “और वह राजलक्ष्मी? उसके त्याग का दु:ख कितना बड़ा है सो तो मैं स्वयं अपनी नजर से देख आया हूँ। इस दु:ख के जोर से ही उसने आज मेरे समस्त हृदय को परिव्याप्त कर रक्खा है...”
अभया ने चौंककर कहा, “तो फिर क्या आप ही उसके...”
मैंने कहा, “यदि ऐसा न होता तो वह इतनी स्वच्छन्दता से मुझे इतनी दूर न पड़ा रहने देती, खो जाने के डर से प्राणपण से खींचकर अपने पास ही रखना चाहती।”
अभया बोली, “इसके मानी यह कि राजलक्ष्मी जानती है कि उसे आपके खोए जाने का डर ही नहीं है?”
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