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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
हठात् अभया की एक बात याद आ गयी। तब भलीभाँति तह तक पहुँचने का मुझे अवकाश नहीं मिला था। उसने कहा था, “श्रीकान्त बाबू, दु:ख का भोग करने में भी एक किस्म का नाशकारी मोह है। मनुष्य ने अपनी युग-युग की जीवन-यात्रा में यह देखा है कि कोई भी बड़ा फल किसी बड़े भारी दु:ख को उठाए बिना नहीं प्राप्त किया जा सकता। उसका जन्म-जन्मान्तर का अनुभव इस भ्रम को सत्य मान बैठा है कि जीवनरूपी तराजू में एक तरफ जितना ही अधिक दु:ख का भार लादा जाय, दूसरी ओर उतना ही अधिक सुख का बोझा ऊपर उठ आता है। इसीलिए तो, मनुष्य जब संसार में अपनी सहज और स्वाभाविक प्रकृति को अपनी इच्छा से वर्जित करके यह समझकर निराहार घूमता फिरता है कि 'मैं तपस्या करता हूँ।' तब, इस सम्बन्ध में कि उसके खाने के लिए कहीं पर उससे चौगुना आहार संचित हो रहा है, न तो उसके ही मन में तिल-भर सन्देह उठता है और न किसी और के ही मन में। इसीलिए, जब कोई संन्यासी निदारुण शीत में गले तक जल-मग्न होकर और भीषण गर्मी की भयंकर धूप में धूनी रमाए जमीन पर सिर और ऊपर पैर करके अवस्थित रहता है तब उसके दु:ख-भोग की कठोरता देखकर दर्शकों के दल केवल दु:ख का ही अनुभव नहीं करते, बल्कि उस पर एकबारगी मुग्ध हो जाते हैं। भविष्य में उसे मिलने वाले आराम के भारी और असम्भव हिसाब की खतौनी करके उनका प्रलुब्ध चित्त ईष्या से व्यस्त हो उठता है और वे कहने लगते हैं कि वह नीचे सिर और ऊपर पैर रखने वाला व्यक्ति ही संसार में धन्य है, मनुष्य-देह धारण करके करने योग्य कार्य वास्तव में वही कर रहा है, हम लोग तो कुछ भी नहीं कर रहे हैं- व्यर्थ ही जीवन गवाँ रहे हैं। इस तरह अपने आपको हजारों धिक्कार देते हुए वे मलीन मन से घर लौट आते हैं। श्रीकान्त बाबू, सुख प्राप्त करने के लिए दु:ख स्वीकार करना चाहिए, यह बात सत्य है किन्तु इसीलिए, यह स्वत: सिद्ध नहीं हो जाता कि जिस तरह भी हो बहुत-सा दु:ख भोग लेने से ही सुख हमारे कन्धों पर आ बैठेगा। यह इहलोक में भी सत्य नहीं है और परलोक में भी नहीं।”
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