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उपन्यास >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


सुनने-मात्र से मेरा मुँह काला पड़ गया। इसके बाद कूल्हा भी देखा और शरीर पर हाथ रखकर ज्वर भी।

मिनट-भर मूढ़ की तरह बैठे रहने के बाद अन्त में बोला, “डॉक्टर को अब तक आपने क्यों नहीं बुला भेजा? अब किसी को जल्दी भेजिए।”

वे बोले, “महाशय, यह देश! यहाँ पर डॉक्टर की फीस भी तो कम नहीं है। उसे लाए नहीं कि चार-पाँच रुपये यों ही चले जाँयगे! सिवाय इसके फिर दवाई के दाम! करीब दो रुपये की दच्च इस तरह और लग जायेगी।”

मैंने कहा, सो लगने दीजिए, बुलाने भेजिए।”

“कौन जायेगा महाशय? तिवारी साला तो चीन्हता भी नहीं है। सिवाय इसके वह चला जायेगा तो खाना कौन पकाएगा?”

“अच्छा, मैं ही जाता हूँ,” कहकर डॉक्टर को बुलाने बाहर चल दिया।

डॉक्टर ने आकर और परीक्षा करके आड़ में ले जाकर पूछा, “ये आपके कौन होते हैं?”

मैंने कहा, “कोई नहीं,” और किस तरह सुबह यहाँ आ पड़ा सो भी मैंने खोलकर कह दिया।

डॉक्टर ने प्रश्न किया, “इनका और भी कोई कुटुम्बी यहाँ पर है क्या?”

मैंने कहा, “सो मुझे नहीं मालूम। शायद कोई नहीं है।”

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