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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
सज्जन की आँखें छलछला आईं। आधा घण्टे की बातचीत में ही एक अपरिचित आदमी की पीड़िता कन्या को एक मूल्यवान् वस्तु का उपहार देना, उन्होंने शायद अपने जीवन में और कभी नहीं देखा था। कहा, “आशीर्वाद दीजिए कि वह अच्छी हो जाय; किन्तु, गरीबी का घर है, इतने कीमती कपड़े का वह क्या करेगी बेटी? आप उसे उठाकर रख लीजिए।” इतना कहकर उन्होंने मेरी ओर भी एक दफे देखा। मैंने कहा, “जब उसकी मौसी पहिरने के लिए दे रही है तब आपका ले जाना ही उचित है।” फिर हँसकर कहा, “सरला का भाग्य अच्छा है, हम लोगों की भी कोई मौसी-औसी होती तो बड़ा सुभीता होता! अबकी बार महाशय, आपकी लड़की, आप देखेंगे कि, चटपट अच्छी हो जायगी।
उस समय उस पुरुष के समस्त चेहरे से कृतज्ञता मानो उछल पड़ने लगी। और आपत्ति न करके उन्होंने उस वस्त्र को ग्रहण कर लिया। अब दोनों जनों में फिर बातचीत होने लगी। गृहस्थाश्रम की बातें, समाज की बातें, सुख-दु:ख की बातें, और न जाने क्या-क्या। मैं सिर्फ खिड़की के बाहर ताकता हुआ स्तब्ध होकर बैठा रहा और जो प्रश्न अपने आपसे बहुत बार पूछ चुका था वही इस छोटी-सी घटना के सूत्र के सहारे फिर मेरे मन में उठ खड़ा हुआ कि इस यात्रा का अन्त कहाँ है?
एक दस-बारह रुपये का वस्त्र दान कर देना राज्यलक्ष्मी के लिए कठिन बात थी और नयी। उसके दास-दासी शायद इस बात का कभी खयाल भी नहीं करते। किन्तु मेरी चिन्ता दूसरी ही थी। यह दी हुई चीज दान के हिसाब से उसके लिए कुछ न थी। यह मैं जानता था। किन्तु, मैं सोच रहा था कि उसके हृदय की धारा जिस ओर लक्ष्य करके अपने आपको नि:शेष करने के लिए उद्दाम के लिए गति से दौड़ी चली जा रही है, उसका अवसान कहाँ होगा और किस तरह?
समस्त रमणियों के अन्तर में 'नारी' वास करती है या नहीं, यह जोर से कहना अत्यन्त दु:साहस का काम है। किन्तु नारी की चरम सार्थकता मातृत्व में है, यह बात शायद खूब गला फाड़ करके प्रचारित की जा सकती है।
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