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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
मैंने कहा, “इसके लिए मैं जरा भी दु:खित नहीं हूँ। अब तो कलकत्ते लौट चलना होगा न?”
प्यारी ने गर्दन हिलाकर बताया, “हाँ।”
मैंने कहा, “क्या मेरा साथ चलना आवश्यक है? न हो तो मैं जरा और पश्चिम की ओर घूम आना चाहता हूँ।”
प्यारी ने कहा, “बंकू के ब्याह में तो अब भी कुछ देर है। चलो न, मैं भी प्रयाग चलकर स्नान कर आऊँ।”
मैं जरा मुश्किल में पड़ गया। मेरे दूर के रिश्ते के एक चचा वहाँ नौकरी करते हैं। सोचा था कि वहीं जाकर ठहरूँगा। सिवाय इसके और भी कई परिचित मित्र दोस्त वहाँ रहते हैं।
प्यारी ने निमेष-मात्र में मेरे मन का भाव ताड़कर कहा, “मैं साथ रहूँगी तो शायद कोई देख लेगा, यही न?'
अप्रतिभ होकर कहा, “वास्तव में कलंक चीज ही ऐसी है कि लोग झूठे कलंक का भी भय किये बगैर नहीं रह सकते।”
प्यारी ने जबर्दस्ती हँसते हुए कहा, “सो ठीक है। गत साल आरे में तो तुम्हें एक तरह से गोद में लिये ही लिये मेरे दिन-रात कटे हैं। सौभाग्य से उस दशा में किसी ने तुम्हें नहीं देखा। उस जगह शायद तुम्हारी जान-पहिचान का कोई बन्धु-बान्धव नहीं था।”
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