|
उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
|
337 पाठक हैं |
||||||||
शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“तुम भी चलो।”
“अनुग्रह करते हो क्या?”
“नहीं चाहतीं?”
“नहीं। जरूरत होगी तब माँग लूँगी, इस समय नहीं।” इतना कहकर वह अपने काम से चली गयी।
मेरे मुँह से केवल एक लम्बी साँस बाहर निकल गयी, किन्तु कोई बात नहीं निकली।
दोपहर को भोजन के समय मैंने हँसकर कहा, “अच्छा लक्ष्मी, मुझसे बोलना बन्द करके क्या तुमसे रहा जायेगा जो इस असाध्य-साधन की कोशिश कर रही हो?”
राजलक्ष्मी ने शान्त-गम्भीर मुद्रा से कहा- “सामने होने पर किसी से नहीं रहा जाता- मुझसे भी नहीं रहा जायेगा। इसके सिवाय, यह मेरी इच्छा भी नहीं है।”
“तब फिर इच्छा क्या है?”
राजलक्ष्मी बोली, “मैं कल से ही सोच रही हूँ कि इस खींच-तान को बन्द किये वगैर नहीं चल सकता। तुमने भी एक तरह से साफ-साफ जता दिया है और मैं भी एक तरह से खूब जान गयी हूँ। गलती मेरी ही हुई, यह मैं स्वीकार करती हूँ, किन्तु...”
उसे सहसा रुकते देख मैंने पूछा, “किन्तु, क्या?”
राजलक्ष्मी बोली, “किन्तु, कुछ भी नहीं। यह जो एक निर्लज्ज वाचाल की तरह याचना करती तुम्हारे पीछे-पीछे घूमती फिरती हूँ,” इतना कहकर उसने एकाएक अपना मुँह मानो घृणा से सिकोड़ लिया और कहा, “लड़का ही क्या सोचता होगा, नौकर-चाकर ही मन ही मन क्या कहते होंगे! राम, राम, मानो मैंने इसे एक हँसी का व्यापार बना डाला है।”
|
|||||

i 









