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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
फिर कुछ ठहरकर कहा, “किन्तु दुनिया तो मनसा पण्डित की पाठशाला की उस राजलक्ष्मी को पहिचानेगी नहीं। वह तो पहिचानेगी सिर्फ पटना की प्रसिद्ध प्यारी बाई को। तब दुनिया की नजरों में कितना छोटा हो जाऊँगा, सो तुम क्या नहीं देख सकती? बतलाओ, तुम उसे किस तरह रोकोगी?”
राजलक्ष्मी ने एक लम्बी साँस छोड़कर कहा, “किन्तु, उसे तो सचमुच में छोटा होना नहीं कहते?”
मैंने कहा, “भगवान की नजर में न हो, किन्तु, संसार की आँखें भी तो उपेक्षा करने की चीज नहीं है लक्ष्मी।”
राजलक्ष्मी ने कहा, “किन्तु, उन्हीं की नजर को ही तो सबसे पहले मानना उचित है।”
मैंने कहा, एक तरह से यह बात सच है। किन्तु, उनकी नजर तो हमेशा दीख नहीं पड़ती और फिर जो दृष्टि संसार में दस आदमियों के भीतर से प्रकाश पाती है, वह भी भगवान की ही दृष्टि है राजलक्ष्मी, इसे भी अस्वीकार करना अन्याय है।”
“इसी डर से तुम मुझे जन्म-भर के लिए छोड़कर चले जाओगे?”
मैं बोला, “फिर मिलूँगा। तुम कहीं भी क्यों न होओ, बर्मा जाने के पहले मैं एक दफे और भी तुमसे मिल जाऊँगा।”
राजलक्ष्मी तेजी के साथ सिर हिलाकर रुँआसे स्वर से कह उठी, “जाते हो तो जाओ। किन्तु तुम मुझे चाहे जैसा क्यों न समझो, मुझसे बढ़कर अपना तुम्हारा और कोई नहीं। पर उसी से मुझको त्याग कर जाना दस आदमियों की निगाह में धर्म है, यह बात मैं कभी स्वीकार नहीं करूँगी।” इतना कहकर वह तेजी से कमरा छोड़कर चली गयी।
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