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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
सारी रात गुजरी, दूसरा दिन गुजरा, उसके बाद का दिन भी कट गया, किन्तु बुखार ने पीछा नहीं छोड़ा। बल्कि, उसे अधिकाधिक चढ़ते देख मन ही मन व्याकुल हो उठा। गोविन्द डॉक्टर इस बेला उस बेला देखने आने लगे। नाड़ी, पकड़कर, जीभ देखकर, पेट ठोककर 'सुस्वादु' ओषधियों की योजना कर केवल 'लागत के दाम' भर लेने लगे, किन्तु एक-एक दिन करके सारा सप्ताह इसी तरह गुजर गया। मेरे पिता के मामा, मेरे बाबा आकर बोले, “इसीलिए तो भइया, मैं कहता हूँ कि वहाँ खबर पठा दो, तुम्हारी फुआ को आ जाने दो। बुखार तो जैसे...”
बात पूरी न होने पर भी मैं समझ गया कि बाबा कुछ मुश्किल में पड़ गये हैं। इस तरह और भी चार-पाँच दिन बीत गये, किन्तु, बुखार में कोई फर्क नहीं हुआ। उस दिन सुबह गोविन्द डॉक्टर ने आकर यथारीति दवाई देकर तीन दिन के बाकी 'लागत के दाम' माँगे। शय्या में पड़े-पड़े किसी तरह हाथ बढ़ाकर अपना बैग खोला- देखा तो मनी-बैग गायब है! अतिशय शंकित होकर मैं उठ बैठा। बैग को औंधा करके हर एक चीज अलग-अलग करके खोज की; किन्तु जो नहीं था सो नहीं मिला।
गोविन्द डॉक्टर मामला समझकर चिन्तित होकर बार-बार सवाल करने लगे, “कुछ चला गया है क्या?”
मैंने कहा, “नहीं, कुछ भी तो नहीं गया।”
किन्तु उनकी दवा का मूल्य जब मैं न दे सका तब वे समझ गये। स्तम्भित की तरह कुछ देर खड़े रहकर उन्होंने पूछा, “थे कितने?”
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