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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
राजलक्ष्मी ने वैसे ही उदास कण्ठ से जवाब दिया, “मेरी लाज-शरम जो कुछ है सो इस समय बस तुम ही हो।”
इसके बाद अब मैं और कहूँ ही क्या! सुनूँ भी क्या? आँखें मूँदकर चुपचाप लेट रहा।
कुछ देर बाद पूछा, “बंकू का विवाह निर्विघ्न हो गया?”
राजलक्ष्मी बोली, “हाँ।”
“अभी कहाँ से आ रही हो?- कलकत्ते से?”
“नहीं पटने से। वहीं पर तुम्हारी चिट्ठी मिली थी।”
“मुझे कहाँ ले जाओगी?- पटने?”
राजलक्ष्मी ने कुछ सोचकर कहा, “एक बार तो वहाँ तुम्हें जाना ही पड़ेगा। पहले कलकत्ते चलें, वहाँ पर तुम्हें दिखा लूँ, उसके बाद तन्दुरुस्त होने पर...”
मैंने सवाल किया, “किन्तु, उसके बाद भी मुझे पटना क्यों जाना पड़ेगा?”
राजलक्ष्मी बोली, दान-पत्र की तो वहीं रजिस्टरी करानी पड़ेगी। लिखा-पढ़ी एक तरह से सब कर आई हूँ; किन्तु तुम्हारे हुक्म के बिना तो कुछ हो न सकेगा।”
अत्यन्त अचरज के साथ पूछा, “क्या बात का दान-पत्र? किसके नाम?”
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