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उपन्यास >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


इस निर्वाक् निस्तब्धता में मग्न रहकर दोनों ने कितना समय बिता दिया, समझता हूँ, इसका किसी ने हिसाब ही नहीं किया। सहसा दरवाजे के बाहर मनुष्य के गले की आवाज सुनकर हम दोनों ही चौंक पड़े और राजलक्ष्मी के शय्या छोड़ने के पहले ही डॉक्टर साहब ने प्रसन्न बाबा को साथ में लिये अन्दर प्रवेश किया। किन्तु, उसके ऊपर दृष्टि पड़ते ही रुककर खड़े हो गये। बाबा जब दिवा-निद्रा ले रहे थे तब यह खबर उनके कानों में अवश्य पड़ गयी थी कि कोई बन्धु कलकत्ते से गाड़ी लेकर मेरे पास आया है, किन्तु वह कोई स्त्री हो सकती है, यह शायद किसी की कल्पना में भी नहीं था। इसीलिए, शायद अब तक घर की स्त्रियाँ भी बाहर नहीं आईं थीं।

बाबाजी अत्यन्त विलक्षण आदमी थे। उन्होंने कुछ देर राजलक्ष्मी के नीचे झुके हुए मुख की ओर देखकर कहा, “यह लड़की कौन है श्रीकान्त? कुछ पहिचानी हुई-सी मालूम होती है।”

डॉक्टर साहब भी प्राय: साथ ही साथ कह उठे, “छोटे काका, मुझे भी ऐसा लगता है जैसे इन्हें कहीं देखा है।”

मैंने तिरछी नजर से देखा, राजलक्ष्मी का सारा मुख-मण्डल जैसे मुर्दे की तरह फक हो गया है उसी क्षण जैसे कोई मेरे हृदय के भीतर से बोल उठा-”श्रीकान्त, इस सर्वस्व-त्यागिनी स्त्री ने केवल तुम्हारे लिए ही स्वेच्छा से यह दु:ख अपने सिर पर उठा लिया है।”

एकबारगी सारी देह रोमांचित हो उठी, मन ही मन बोला, मुझे सत्य से मतलब नहीं, आज मैं मिथ्या को ही सर पर धारण करूँगा और दूसरे ही क्षण उसके हाथ को जरा दबाकर कह बैठा, “तुम अपने पति की सेवा करने आई हो। तुम्हें लाज किस बात की है राजलक्ष्मी? ये बाबा और डॉक्टर साहब हैं, इनको प्रणाम करो।”

पल-भर के लिए दोनों की चार आँखें हो गयीं; इसके बाद उसने उठकर जमीन पर सिर टेककर दोनों को प्रणाम किया।

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