लोगों की राय

उपन्यास >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

Like this Hindi book 7 पाठकों को प्रिय

337 पाठक हैं

शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


रतन ने जताया, “साँइथिया या ऐसी ही किसी स्टेशन से करीब दस-बारह कोस बैलगाड़ी में जाना पड़ता है। रास्ता जितना कठिन है उतना ही भयंकर। चारों तरफ मैदान ही मैदान है। उसमें न तो कहीं फसल ही होती है और न कहीं एक बूँद पानी है। कँकरीली मिट्टी है, कहीं गेरुआ और कहीं जली-हुई-सी स्याह काली।” यह कहकर वह जरा रुका, और खास तौर से मुझे ही लक्ष्य करके फिर कहने लगा, “बाबूजी, मेरी तो कुछ समझ ही में नहीं आता कि आदमी वहाँ किस सुख के लिए रहते हैं। और जो ऐसी सोने की सी जगह छोड़कर वहाँ जाते हैं, उनसे मैं और क्या कहूँ।”

भीतर-ही-भीतर एक लम्बी साँस लेकर मैं मौन हो रहा। ऐसी सोने की-सी जगह छोड़कर क्यों उस मरु-भूमि के बीच निर्बान्धव नीच आदमियों के देश में राजलक्ष्मी मुझे लिये जा रही है, सो न तो उससे कहा जा सकता है और न समझाया ही जा सकता है।

आखिर मैंने कहा, “शायद मेरी बीमारी की वजह से ही जाना पड़ रहा है, रतन। यहाँ रहने से आराम होने की कम आशा है, सभी डॉक्टर यही डर दिखा रहे हैं।”

रतन ने कहा, “लेकिन बीमारी क्या यहाँ और किसी को होती ही नहीं बाबूजी? आराम होने के लिए क्या उन सबको उस गंगामाटी में ही जाना पड़ता है?”

मन-ही-मन कहा, “मालूम नहीं, उन सबको किस माटी में जाना पड़ता है। हो सकता है कि उनकी बीमारी सीधी हो, हो सकता है कि उन्हें साधारण मिट्टी में ही आराम पड़ जाता हो। मगर हम लोगों की व्याधि सीधी भी नहीं है और साधारण भी नहीं; इसके लिए शायद उसी गंगामाटी की ही सख्त जरूरत है।”

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book