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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
बात ठीक है। लेकिन इसी रतन से अगर जिरह करके पूछा जाय तो मालूम होगा कि वह खुद भी इस बात पर विश्वास नहीं करता।
सहसा देखा कि राजलक्ष्मी एक पत्थर की प्याली में कुछ लिये हुए व्यस्त भाव से इधर ही से नीचे जा रही है। मैंने बुलाकर कहा, “सुनो तो, सभी कहते हैं कि तुम जादू-मन्त्र जानती हो!”
वह चौंककर खड़ी हो गयी और बोली, “क्या जानती हूँ?”
मैंने कहा, “जादू-मन्त्र!”
राजलक्ष्मी ने मुँह बिचकाकर जरा मुस्कराते हुए कहा, “हाँ, जानती हूँ।”
यह कहकर वह चली जा रही थी, सहसा मेरे कुरते को गौर से देखकर उद्विग्न कण्ठ से पूछ उठी, “यह क्या? कल का वही बासी कुरता पहने हुए हो क्या?”
अपनी तरफ देखकर मैंने कहा, “हाँ, वही है। मगर रहने दो, खूब उजला है।”
राजलक्ष्मी ने कहा, “उजले की बात नहीं, मैं सफाई की बात कह रही हूँ।” इसके बाद फिर जरा मुस्कराकर कहा, “तुम बाहर के इस दिखावटी उजलेपन में ही हमेशा गर्क रहे! इसकी उपेक्षा करने को मैं नहीं कहती, मगर भीतर पसीने से गन्दगी बढ़ जाती है, इस बात पर गौर करना कब सीखोगे?” इतना कहकर उसने रतन को आवाज दी। किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। कारण, मालकिन की इस तरह की ऊँची-मीठी आवाज का जवाब देना इस घर का नियम नहीं, बल्कि चार-छह मिनट के लिए मुँह छिपा जाना ही नियम है।
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