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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
मैं पहले ही कह चुका हूँ कि राजलक्ष्मी मेरे मन की बातों को मानो दर्पणवत् स्पष्ट देख सकती है। कैसे देख सकती है, सो नहीं जानता; परन्तु अभी इस अस्पष्ट दीपालोक में मेरे चेहरे की तरफ उसने देखा नहीं, फिर भी मानो मेरी निभृत चिन्ता के ठीक द्वार पर ही उसने आघात किया। बोली, “तुम सोच रहे हो, 'यह बहुत ही ज्यादती है- भविष्य के लिए विधि-विधान कोई पहले से ही निर्दिष्ट नहीं कर सकता।' मगर मैं कहती हूँ, कर सकता है। मैंने अपने गुरुदेव के श्रीमुख से सुना है। यह काम अगर उनसे न होता, तो हम सजीव मन्त्रों के कभी दर्शन ही न कर पाते। मैं पूछती हूँ, इस बात को मानते हो कि हमारे शास्त्रीय मन्त्रों में प्राण हैं। वे सजीव हैं?”
मैंने कहा, “हाँ।”
राजलक्ष्मी ने कहा, “तुम नहीं मान सकते हो, परन्तु फिर भी यह सत्य है। नहीं तो हमारे देश में यह गुड्डा-गुड़ियों का ब्याह ही संसार का सर्वश्रेष्ठ विवाह-बन्धन नहीं हो सकता। यह सभी तो उन्हीं सजीव मन्त्रों के जोर से होता है! उन्हीं ऋषियों की कृपा से! अवश्य ही, अनाचार और पाप और कहाँ नहीं हैं, सब जगह हैं, मगर हमारे इस देश के समान सतीत्व क्या तुम और कहीं भी दिखा सकते हो?”
मैंने कहा, “नहीं।” कारण, यह उसकी युक्ति नहीं, बल्कि विश्वास है। इतिहास का प्रश्न होता तो उसे दिखा देता कि इस पृथ्वी, पर सजीव मन्त्र-हीन और भी बहुत-से देश हैं, जहाँ सतीत्व का आदर्श आज भी ऐसा ही उच्च है। अभया का उल्लेख करके कह सकता था कि अगर यही बात है तो तुम्हारे सजीव मन्त्र स्त्री-पुरुष दोनों को एक ही आदर्श में क्यों नही बाँध सकते? मगर इन सब बातों की आवश्यकता न थी। मैं जानता था कि उसके चित्त की धारा कुछ दिनों से किस दिशा में बह रही है।
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