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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
मैंने कहा, “चलोगी नहीं?”
उसने कहा, “चलने ही के लिए तो खड़ी हूँ।” यह कहकर वह गाड़ी के भीतर जाकर बैठ गयी।
रतन साथ जायेगा, वह मेरे पीछे था। उसका चेहरा देखते ही मैं ताड़ गया कि वह मालकिन की साज-पोशाक देखकर अत्यन्त आश्चर्यान्वित हो रहा है। मुझे भी आश्चर्य हुआ; परन्तु जैसे उसने प्रकट नहीं किया वैसे ही मैं भी चुप रह गया। घर पर वह कभी ज्यादा गहने नहीं पहिनती और कुछ दिनों से तो उसमें भी कमी करती जाती थी; परन्तु आज देखा कि उसके बदन पर उनमें से भी लगभग कुछ नहीं है। जो हार साधारणत: रोज ही उसके गले में पड़ा रहता है सिर्फ वही है और हाथों में एक-एक कड़ा। ठीक याद नहीं है, फिर भी इतना खयाल है कि कल रात तक जो चूड़ियाँ उसके हाथों में थीं उन्हें भी आज उसने जान-बूझकर उतार दिया है। साड़ी भी बिल्कुल मामूली पहिने थी, शायद नहाकर जो पहिनी थी वही होगी। गाड़ी में बैठकर मैंने धीरे से कहा, “एक-एक करके सभी कुछ छोड़ दिया मालूम होता है। सिर्फ एक मैं ही बाकी रह गया हूँ!”
राजलक्ष्मी ने मेरे मुँह की तरफ देखकर जरा हँसते हुए कहा, “ऐसा भी तो हो सकता है कि इस एक ही में सब कुछ रह गया हो। इसी से, जो बढ़ती था वह एक-एक करके झड़ता जा रहा है।” यह कहकर उसने पीछे की तरफ मुँह करके देखा कि रतन कहीं पास ही तो नहीं है; उसके बाद उसने ऐसे धीमे और मृदु कण्ठ से कहा जिसे गाड़ीवान भी न सुन सके, “अच्छा तो है, ऐसा ही आशीर्वाद दो न तुम। तुमसे बड़ा तो और कुछ मेरे लिए है नहीं, तुम्हें भी जिसके बदले में आसानी से दे सकूँ, मुझे वही आशीर्वाद दो।”
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