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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
वे पहले कुछ समझ न सकीं, पीछे समझने पर बोलीं, “उस विजय की बात कह रहे हो? वह तो हमारा लड़का नहीं है बेटा, वह तो एक विद्यार्थी है। देवरजी के टोल में¹ पढ़ता था, अब भी वहीं पढ़ता है, सिर्फ रहता हमारे यहाँ है।” यों कहकर वे विजय के सम्बन्ध में हमारी अज्ञानता को दूर करती हुई कहने लगीं, “कितने कष्ट से मैंने देवर को पाल-पोसकर आदमी बनाया सो एक सिर्फ भगवान ही जानते हैं, और मुहल्ले के लोग भी कुछ-कुछ जानते हैं। पर खुद वह आज सब कुछ भूल गया, सिर्फ हम लोग नहीं भूल सके हैं।” इतना कहकर फिर उन्होंने आँखों के किनारे पोंछते हुए कहा, “पर उन सब बातों को जाने दो बेटा, बहुत-सी बातें हैं। मैंने देवर का जनेऊ करवाया, इन्होंने पढ़ने के लिए उसे मिहिरपुर के शिबू तर्कालंकार के टोल में भिजवाया। बेटा, लड़के को छोड़कर रहा नहीं गया तो मैं खुद जाकर कितने दिन मिहिरपुर रह आई, सो भी आज उसे याद नहीं आता। जाने दो, इस तरह कितने वर्ष बीत गये, कोई ठीक है भला। देवर की पढ़ाई पूरी हुई, वे उसे गृहस्थ बनाने के लिए लड़की की तलाश में घूमा किये; इतने में, न कुछ कहना न सुनना, अचानक एक दिन शिबू तर्कालंकार की लड़की सुनन्दा से ब्याह करके आप बहू घर ले आया। मुझसे न कहा तो न सही, पर अपने भइया तक से कोई राय न ली।” (¹ पुराने ढंग की संस्कृत की घरेलू पाठशाला।)
मैंने धीरे से पूछा, “राय न लेने का क्या कोई खास कारण था?”
गृहिणी ने कहा, “था क्यों नहीं। वे हमारे ठीक बराबरी के न थे, कुल, शील और सम्मान में भी बहुत छोटे थे। इन्हें बहुत गुस्सा आया, दु:ख और लज्जा के मारे शायद महीने-भर तो किसी से बातचीत तक नहीं की; पर मैं गुस्सा नहीं हुई। सुनन्दा का मुँह देखकर मैं पहले से ही मानो पिघल-सी गयी। उस पर जब सुना कि उसकी माँ मर गयी और बाप उसे देवर के हाथ सौंपकर खुद संन्यासी होकर निकल गये हैं, तो उस नन्हीं-सी बहू को पाकर मुझे कितनी खुशी हुई सो मैं मुँह की बातों से नहीं समझ सकती। पर वह किसी दिन इस तरह का बदला लेगी, सो कौन जानता था।” इतना कहकर सहसा वे सुपुक-सुपुककर रोने लगीं। समझ गया कि वहीं पर व्यथा अत्यन्त तीव्र हो उठी है; मगर फिर भी चुप रहा। राजलक्ष्मी भी अब तक कुछ नहीं बोली थी; उसने धीरे से पूछा, “अब वे कहाँ रहते हैं?”
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