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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“मैं तो दंग रह गयी, मैंने कहा, “सुनो इसकी बातें जरा। कन्हाई बसाक की सारी जायदाद कर्ज के मारे बिक जाने पर, इन्होंने उसे खरीद लिया है। भला, अपनी खरीदी हुई जायदाद को कौन किसी गैर के लिए छोड़ देता है छोटी बहू?”
छोटी बहू ने कहा, “पर जेठजी के पास इतना रुपया आया कहाँ से?”
“मैंने गुस्से से आकर कह दिया, “सो पूछ जाकर अपने जेठजी से- जिन्होंने जायदाद खरीदी है।” यह कहकर मैं पूजा-आह्निक करने चली गयी।”
राजलक्ष्मी ने कहा, “बात तो ठीक है। जो जायदाद नीलाम पर चढ़कर नीलाम हो चुकी, उसे फेर देने के लिए छोटी बहू कह कैसे सकती थी?”
कुशारी-गृहिणी ने कहा, “बताओ तो बेटी!”
परन्तु यह कहते हुए भी उनके चेहरे पर लज्जा की मानो एक काली छाया-सी पड़ गयी। बोलीं, “लेकिन, ठीक नीलाम होकर नहीं बिकी थी न, इसी से। हम लोग थे उसके पुरोहित वंश के। कन्हाई बसाक मरते समय इन्हीं पर सब भार दे गया था। पर तब तो यह जानते न थे कि वह अपने पीछे दुनिया-भर का कर्जा भी छोड़ गया है।”
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