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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“हाय री जली तकदीर! उसे भी कलमुँही ने भीतर भीतर इतना बस कर रक्खा था! अब मेरी आँखें खुलीं। उस दिन भादों की सँकराँत थी, आकाश में बादल उमड़ रहे थे, रह-रहकर झरझर पानी बरस रहा था, मगर अभागी ने एक रात के लिए भी मेरी बात न रक्खी, लड़के का हाथ पकड़कर घर से निकल गयी। मेरे ससुर के जमाने की एक रिआया थी जिसे मरे आज दो साल हो गये, उसी के टूटे-फूटे खण्डहर घर में एक कोठरी किसी तरह खडी थी; सियार, कुत्ते, साँप-मेंढकों के साथ जाकर, ऐसे बुरे दिनों में, वह उसी में रहने लगी। मैंने आँगन के बीच मिट्टी-पानी में लोटते हुए रो-रोकर कहा, “सत्यानासिन, यही अगर तेरे मन में थी, तो इस घर में तू आई ही क्यों थी? बिनू तक को ले आई, तूने क्या ससुर-कुल का नाम तक दुनिया से मिटा देने की प्रतिक्षा की है?” मगर उसने कोई जवाब नहीं दिया। मैंने फिर कहा, “खायगी क्या?” जवाब मिला, “ससुरजी जो तीन बीघा ब्रह्मोत्तर जमीन छोड़ गये हैं, उसमें से आधी हमारी है।” उसकी बात सुनकर मेरी तो तबीयत हुई कि सिर पटककर मर जाऊँ। मैंने कहा, “अभागी, उससे तो एक दिन की भी गुजर न होगी। तुम लोग माना, कि बिना खाये ही मर सकते हो, पर मेरा बिनू?” बोली, “एक बार कन्हाई बसाक के लड़के के बारे में तो सोच देखो जीजी। उसकी तरह एक छाक खाकर भी अगर बिनू जिन्दा रहे तो बहुत है।”
आखिर वे चले गये। सारा घर मानो हाहाकार करके रोने लगा। उस रात को न तो घर में बत्ती जली न चूल्हा सुलगा; उन्होंने बहुत रात बीते घर लौटकर सारी रात उसी खूँटी के सहारे बैठे बिता दी। शायद बिनू मेरा न सोया होगा; शायद बच्चा मेरा भूख के मारे तड़फड़ाता होगा; सो सबेरा होते ही राखाल के हाथ गाय और बछिया भिजवा दी, पर उस राक्षसी ने लौटा दी और कहला भेजा, “बिनू को मैं दूध नहीं पिलाना चाहती, उसे बिना दूध के ही जिन्दा रहने की शिक्षा देना चाहती हूँ।”
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