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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
इस तरह के उलझनों और शिकायतों से सिर्फ रतन ही अकेला नहीं, घर-भर के हम सभी अभ्यस्त हो गये थे; इसलिए, वह भी जैसे चुप रह गया मैं भी वैसे ही कुछ नहीं बोला। देखा कि एक बड़ी टोकनी में चावल-दाल-घी-तेल आदि तथा दूसरी एक छोटी डलिया में नाना प्रकार की भोज्य सामग्री सजाई गयी है। मालूम होता है कि इनके परिमाण और इनके ढोने की शक्ति-सामर्थ्य के विषय में ही रतन प्रतिवाद कर रहा था। ठीक यही बात निकली। राजलक्ष्मी ने मुझे मध्यस्थ मानते हुए कहा, “सुनो इसकी बात। इससे इतना-सा बोझ ले जाते न बनेगा! इतना तो मैं भी ले जा सकती हूँ, रतन!” यह कहते हुए उसने खुद झुककर उस बोझे को आसानी से उठा लिया।
वास्तव में, बोझ के लिहाज से एक आदमी के लिए- और तो क्या रतन के लिए भी उसका ले जाना कोई कठिन न था; पर कठिन थी एक दूसरी बात। इससे रतन की इज्जत में बट्टा जो लगता! पर शरम के मारे मालिक के सामने उस बात को वह मंजूर नहीं कर सकता। मैं उसका चेहरा देखते ही बड़ी आसानी से ताड़ गया। मैंने हँसकर कहा, “तुम्हारे यहाँ तो काफी आदमी हैं, रिआया की भी कमी नहीं-उन्हीं में से किसी को भेज दो। रतन, न हो तो उसके साथ-साथ चल जायेगा रीते-हाथ।”
रतन नीचे को निगाह किये खड़ा रहा। राजलक्ष्मी एक बार मेरी तरफ और एक बार उसकी तरफ देखकर हँस पड़ी; बोली, “अभागा आधे घण्टे तक झगड़ता तो रहा, पर मुँह से बोला नहीं कि माँ, ये सब छोटे काम रतन बाबू नहीं कर सकेंगे! अब जा, किसी को बुला ला।”
उसके चले जाने पर मैंने पूछा, “सबेरे उठते ही यह सब क्या शुरू कर दिया?”
राजलक्ष्मी ने कहा, “आदमी के खाने की चीजें सबेरे ही भेजी जाती हैं।”
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