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उपन्यास >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


“यह ठीक है। उसे भी लौटा दो।”

“लौटा देना ही ठीक है, श्रीकान्त। आँखों के सामने ही आम पकते हैं, लड़के-बच्चे ठण्डी आहें भरते हैं- मुझे बहुत दु:ख होता है भाई! आम के दिनों में मेरे सब बगीचे व्यापारी लोग ले लेते हैं, सिर्फ वह बगीचा नहीं बेचता। कह दिया है, चक्रवर्ती, तुम्हारे नाती तोड़-तोड़कर खायें। क्या कहते हो ठीक किया न?”

'बिल्कुल ठीक।” मन-ही-मन कहा, बैंकुण्ठ के खाते की जय हो! उसकी बदौलत यदि गरीब नयनचाँद यत्किंचित् लाभ उठा सके तो नुकसान ही क्या है? इसके अलावा गौहर कवि है। कवि की इतनी सम्पत्ति किस मतलब की अगर रसग्राही रसिक सुजनों के काम में न आय?

लगभग चैत्र के बीचोंबीच की बात है। गाड़ी की खिड़की को एकाएक अन्त तक खोलकर गौहर ने बाहर सिर निकालते हुए कहा, “दक्षिणी हवा का अनुभव हो रहा है श्रीकान्त?”

“हो रहा है।”

गौहर ने कहा, “वसन्त को पुकारते हुए कवि ने कहा है- 'खोल दे आज दखिन का द्वार'।”

कच्ची मिट्टी का रास्ता है। मलय पवन के एक झोंके ने रास्ते की सूखी धूल को जमीन पर नहीं रहने दिया, उससे समस्त मुँह और सिर को भर दिया। मैं अप्रसन्न होकर बोला, “कवि ने वसन्त को नहीं बुलाया। वह कहता है कि इस वक्त यम का दक्षिण द्वार खुला है- अत: गाड़ी को बन्द न करोगे, तो शायद वही आकर हाजिर हो जायेगा।”

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