लोगों की राय

उपन्यास >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

Like this Hindi book 7 पाठकों को प्रिय

337 पाठक हैं

शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


खैर, जो हो, उन लोगों का मकान बचपन में देखा था। ठीक से याद नहीं। अब वह शायद कवि की वाणी-साधना के तपोवन में रूपान्तरित हो गया हो। उसे एक बार आँखों से देखने की इच्छा हुई।

उसके ग्राम के पथ से मैं परिचित हूँ, उसकी दुर्गमता भी याद आती है। किन्तु थोड़ी ही देर बाद मालूम हो गया कि शैशव की उस याद के साथ आज की आँखों से देखने की कतई तुलना नहीं हो सकती। बादशाही जमाने की सड़क है अतिशय सनातन। मिट्टी पत्थरों की परिकल्पना यहाँ के लिए नहीं है! कोई करेगा, ऐसी दुराशा भी कोई नहीं करता। इतना ही नहीं, संस्कार या मरम्मत की सम्भावना भी लोगों के मन से बहुत समय पहले ही पुंछ गयी है। गाँव वाले जानते हैं कि शिकायत या अभियोग फिजूल है- उनके लिए किसी भी दिन राजकोष में रुपये नहीं होंगे। वे जानते हैं कि पुरुषानुक्रम से सड़क के लिए सिर्फ सड़क-टैक्स देना पड़ता है पर वह सड़क कहाँ है और किसके लिए है, यह सब सोचना भी उनके लिए ज्यादती है।

उस सड़क पर बहुकाल से संचित और स्तूपीकृत बालू और मिट्टी की रुकावट को हटाती हुई हमारी गाड़ी सिर्फ चाबुक के जोर से अग्रसर हो रही थी। ऐसे ही वक्त गौहर एकाएक बड़े जोर से चिल्ला उठा, “गाड़ीवान! और नहीं- और नहीं, ठहरो-एकदम रोको!”

उसने यह इस तरह कहा जैसे पंजाब-मेल का मामला हो-जैसे पल-भर में ही सब वैक्युम ब्रेक अगर बन्द न किये जा सके तो सर्वनाश की सम्भावना हो।

गाड़ी रुक गयी। बाँयें हाथवाला रास्ता उनके गाँव जाने का है। उतरकर गौहर ने कहा, “श्रीकान्त, उतर आओ। मैं बैग ले लेता हूँ, तुम बिछौना उठाओ, चलो।”

“शायद गाड़ी और आगे नहीं जायेगी?”

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book