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प्रेमचन्द की कहानियाँ 35

प्रेमचंद

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :380
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9796
आईएसबीएन :9781613015339

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प्रेमचन्द की सदाबहार कहानियाँ का पैंतीसवाँ भाग


रामचन्द्र को उन दोनों लड़कों से इतना प्रेम हो गया था कि वह उसी समय ऋषि वाल्मीकि के पास गये और उनसे कहा- महाराज! आपसे एक प्रश्न करने आया हूं, दया कीजियेगा।

ऋषि ने मुस्कराकर कहा- राजा रंक से प्रश्न करने आया है? आश्चर्य है। कहिये।

रामचन्द्र ने कहा- मैं चाहता हूं कि इन दोनों लड़कों को, जिन्होंने आपके रचे हुए पद सुनाये हैं, अपने पास रख लूं। मेरे अंधेरे घर के दीपक होंगे। हैं तो किसी अच्छे वंश के लड़के?

वाल्मीकि ने कहा- हां, बहुत उच्च वंश के हैं। ऐसा वंश भारत में दूसरा नहीं है।

राम- तब तो और भी अच्छा है। मेरे बाद वही मेरे उत्तराधिकारी होंगे। उनके मातापिता को इसमें कोई आपत्ति तो न होगी?

वाल्मीकि- कह नहीं सकता। सम्भव है आपत्ति हो पिता को तो लेशमात्र भी न होगी, किन्तु माता के विषय में कुछ भी नहीं कह सकता। अपनी मर्यादा पर जान देने वाली स्त्री है।

राम- यदि आप उस देवी को किसी प्रकार सम्मत कर सकें तो मुझ पर बड़ी कृपा होगी।

वाल्मीकि- चेष्टा करूंगा। मैंने ऐसी सज्जन, लज्जाशीला और सती स्त्री नहीं देखी। यद्यपि उसके पति ने उसे निरपराध, अकारण त्याग दिया है, किन्तु यह सदैव उसी पति की पूजा करती है।

रामचन्द्र की छाती धड़कने लगी। कहीं यह मेरी सीता न हो। आह दैव, यह लड़के मेरे होते! तब तो भाग्य ही खुल जाता।

वाल्मीकि फिर बोले- बेटा, अब तो तुम समझ गये होगे कि मैं किस ओर संकेत कर रहा हूं।

रामचन्द्र का चेहरा आनन्द से खिल गया। बोले- हां, महाराज, समझ गया।

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