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प्रेमचन्द की कहानियाँ 41

प्रेमचंद

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :224
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9802
आईएसबीएन :9781613015391

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प्रेमचन्द की सदाबहार कहानियाँ का इकतालीसवाँ भाग


खत मेरे हाथ से छूटकर गिर पडा। दुनिया आंखों में अंधेरी हो गई, मुंह से एक ठंडी आह निकली। बिना एक क्षण गंवाए मैंने बिस्तर बांधा और नैनीताल चलने को तैयार हो गया। घर से निकला ही था कि प्रोफेसर बोस से मुलाकात हो गई। कालेज से चले आ रहे थे, चेहरे पर शोक लिखा हुआ था। मुझे देखते ही उन्होंने जेब से एक तार निकालकर मेरे सामने फेंक दिया। मेरा कलेजा धक् से हो गया। आंखों मे अंधेरा छा गया, तार कौन उठाता है, हाय मारकर बैठ गया। लीला, तू इतनी जल्द मुझसे जुदा हो गई।

मैं रोता हुआ घर आया और चारपाई पर मुंह ढॉँपकर खूब रोया। नैनीताल जाने का इरादा खत्म हो गया। दस-बारह दिन तक मैं उन्माद की–सी दशा मैं इधर–उधर घूमता रहा। दोस्तों की सलाह हुई कि कुछ रोज के लिए कहीं घूमने चले जाओ। मेरे दिल में भी यह बात जम गई। निकल खड़ा हुआ और दो महीने तक विंध्याचल, पारसनाथ वगैरह पहाडियों में आवारा फिरता रहा। ज्यों-त्यों करके नयी-नयी जगहों और दृश्यों की सैर से तबियत का जरा तस्कीन हुई। मैं आबू में था जब मेरे नाम तार पहुंचा कि मैं कॉलेज की असिस्टैण्ट प्रोफेसरी के लिए चुना गया हूँ। जी तो न चाहता था कि फिर इस शहर में आऊं, मगर प्रिन्सिपल के खत ने मजबूर कर दिया। लाचार, लौटा और अपने काम में लग गया। जिन्दादिली नाम को न बाकी रही थी। दोस्तों की संगत से भागता और हंसी-मजाक से चिढ़ मालूम होती।

एक रोज शाम के वक्त मैं अपने अंधेरे कमरे में लेटा हुआ कल्पना लोक की सैर कर रहा था कि सामनेवाले मकान से गाने की आवाज आई। आह, क्या आवाज थी, तीर की तरह दिल में चुभी जाती थी, स्वर कितना करुण था इस वक्त मुझे अन्दाजा हुआ कि गाने में क्या असर होता है। तमाम रोंगटे खडे हो गये। कलेजा मसोसने लगा और दिल पर एक अजीब वेदना-सी छा गई। आंखों से आंसू बहने लगे। हाय, यह लीला का प्यारा गीत था:
पिया मिलन है कठिन बावरी।

मुझसे जब्त न हो सका, मैं एक उन्माद की-सी दशा में उठा और जाकर सामनेवाले मकान का दरवाजा खटखटाया। मुझे उस वक्त यह चेतना न रही कि एक अजनबी आदमी के मकान पर आकर खड़े हो जाना और उसके एकांत में विघ्न डालना परले दर्जे की असभ्यता है।

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