मानस और भागवत में पक्षी - रामकिंकर जी महाराज Manas Aur Bhagwat Me Panchhi - Hindi book by - Ramkinkar Ji Maharaj
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मानस और भागवत में पक्षी

रामकिंकर जी महाराज

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :42
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9816
आईएसबीएन :9781613016121

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रामचरितमानस और भागवत में पक्षियों के प्रसंग

।। श्रीराम शरणं मम्।।

मानस और भागवत में पक्षी

‘श्रीरामचरितमानस’ विलक्षण एवं महत्त्वपूर्ण सांकेतिक भाषा में प्रस्तुत किया गया है। यही बात ‘श्रीमद्भागवत’ के सन्दर्भ में भी है, ‘श्रीमद्भागवत्’ के वक्ता परमहंस शुकदेव हैं। यहाँ पर दो शब्द जुड़े हुए हैं, एक ओर तो उन्हें शुक के रूप में प्रस्तुत किया गया और शुक एक पक्षी है, पर उसके शुकत्व के साथ-साथ हंस शब्द भी जुड़ा हुआ है तथा उसका तात्पर्य यह है कि ‘श्रीमद्भागवत्’ के जो श्रेष्ठतम वक्ता हैं, चाहे आप उन्हें हंस के रूप में देखें और चाहे शुक के रूप में देखें, वे हमारे वंदनीय हैं। जब आप ‘श्रीमद्भागवत’ के साथ-साथ ‘श्रीरामचरितमानस’ पर ध्यान देंगे तो इसके वक्ता भी एक पक्षी हैं और श्रोता के रूप में भी दूसरे पक्षी का उल्लेख किया गया है। वक्ता श्रीकाकभुशुण्डिजी हैं और श्रोता गरुड़जी हैं और इस तरह से ये दोनों विलक्षण हैं। इनमें जिन पक्षियों के नाम का सांकेतिक उल्लेख किया गया है और जिस रूप में उनकी ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया गया है, बहुधा उनके अंतरंग अर्थ की ओर लोगों की दृष्टि नहीं जाती है, पर ‘श्रीरामचरितमानस’ में उसे और भी स्पष्ट किया गया है।

पक्षी शब्द के ‘रामायण’ में दो अर्थ किये गये हैं, उसके एक अर्थ से तो सभी परिचित हैं कि जो आकाश में उड़ने वाला है और जिसके पास दो पक्ष होते हैं, वह पक्षी है, पर ‘रामायण’ में साथ-साथ यह कहा गया कि पक्षी का तात्पर्य है कि जिसके अन्तःकरण में कोई पक्षपात हो। यों कह सकते हैं कि इन महापुरुषों का वर्णन पक्षी के रूप में किया गया है और जब पक्षी का अर्थ पक्षपाती किया गया है तो इसमें एक मधुर संकेत है और वह यह है कि पक्षपात की व्यवहार में बड़ी निन्दा की जाती है, बड़ी आलोचना की जाती है तथा निष्पक्षता की बड़ी प्रशंसा की जाती है, लेकिन वस्तुतः मनुष्य के अन्तःकरण का जो स्वाभाविक निर्माण हुआ है, उसमें निष्पक्षता किसी प्रकार से सम्भव नहीं है। यों कह सकते हैं कि अन्त में व्यक्ति के सारे व्यवहारों में किसी न किसी प्रकार का पक्षपात तो दिखायी ही देता है, चाहे वह सिद्धान्त का पक्षपात हो, चाहे वह भाषा का पक्षपात हो, चाहे विचार का पक्षपात हो। किसी न किसी प्रकार का पक्षपात प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में है, भले ही वह कितना ही निष्पक्ष क्यों न बनना चाहे।

आगे....


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