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चन्द्रकान्ता सन्तति - 5

देवकीनन्दन खत्री

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चन्द्रकान्ता सन्तति 5 पुस्तक का ई-संस्करण...

।। सत्रहवाँ भाग ।।

पहिला बयान


हमारे पाठक ‘लीला' को भूले न होगें। तिलिस्मी दारोगावाले बँगले की बर्बादी के पहिले तक इसका नाम आया है, जिसके बाद फिर इसका जिक्र नहीं आया*। (* देखिए चन्द्रकान्ता सन्तति, नौवाँ भाग, आठवाँ बयान।)

लीला को जमानिया की खबरदारी पर मुकर्रर करके मायारानी काशीवाले नागर के मकान में चली गयी थी और वहाँ दरोगा के आ जाने पर उसके साथ इन्द्रदेव के यहाँ चली गयी। जब इन्द्रदेव के यहाँ से भी वह भाग गयी और दारोगा तथा शेरअलीखाँ की मदद से रोहतासगढ़ के अन्दर घुसने का प्रबन्ध किया गया जैसाकि सन्तति के बारहवें भाग के तेरहवें बयान में लिखा गया है, उस समय लीला मायारानी के साथ थी, मगर रोहतासगढ़ में जाने से पहिले मायारानी ने उसे अपनी हिफाजत का जरिया बनाकर पहाड़ के नीचे ही छोड़ दिया था। मायारानी ने अपना तिलिस्मी तमंचा, जिससे बेहोशी के बारुद की गोली चलायी जाती थी, लीला को देकर कह दिया था कि मैं शेरअलीखाँ की मदद से और उन्हीं के भरोसे पर रोहतासगढ़ के अन्दर जाती हूँ, मगर ऐयारों के हाथ मेरा गिरफ्तार हो जाना कोई आश्चर्य नहीं, क्योंकि बीरेन्द्रसिंह के ऐयार बड़े ही चालाक हैं। यद्यपि उनसे बचे रहने की पूरी-पूरी तरकीब की गयी है, लेकिन फिर भी मैं बेफिक्र नहीं रह सकती, अस्तु यह तिलिस्मी तमंचा तू अपने पास रख और इस पहाड़ के नीचे ही रहकर हम लोगों के बारे में टोह लेती रह, अगर हम लोग अपना काम करके राजी-खुशी के साथ लौट आये तब तो कोई बात नहीं, ईश्वर न करे कहीं मैं गिरफ्तार हो गयी तो तू मुझे छुड़ाने का बन्दोबस्त कीजियो और इस तमंचे से काम निकालियो। इसमें चलानेवाली गोलियाँ और वह ताम्रपत्र भी मैं तुझे दिये जाती हूँ, जिसमें गोली बनाने की तरकीब लिखी हुई है।

जब दारोगा और शेरअलीखाँ सहित मायारानी गिरफ्तार हुई और वह खबर शेरअलीखाँ के लश्कर में पहुँची जो पहाड़ के नीचे था तो लीला ने भी सब हाल सुना और वह उसी समय वहाँ से टलकर छिप रही, फिर भी जब तक राजा बीरेन्द्रसिंह वहाँ से चुनारगढ़ की तरफ रवाना न हुए, वह भी उस इलाके के बाहर न गयी और इसी से शिवदत्त और कल्याणसिंह (जो बहुत से आदमियों को लेकर रोगहतासगढ़ के तहखाने में घुसे थे) वाला मामला भी उसे बखूबी मालूम हो गया था।

माधवी, मनोरमा और शिवदत्त ने जब ऐयारों की मदद से कल्याणसिंह को छुड़ाया था तो भीमसेन भी उसी के साथ ही छुड़ाया गया, मगर भीमसेन कुछ बीमार था, इसलिए शिवदत्त के साथ मिल-जुलकर रोहतासगढ़ के तहखाने में न जा सका था, शिवदत्त ने अपने ऐयारों की हिफाजत में उसे शिवदत्तगढ़ भेज दिया था।

सब बखेड़ों से छुट्टी पाकर जब राजा बीरेन्द्रसिंह कैदियों को लिये हुए चुनारगढ़ की तरफ रवाना हुए तो मायारानी को कैद से छुड़ाने की फिक्र में लीला भी भेष बदले हुए उन्हीं के लश्कर के साथ रवाना हुई। लश्कर में नकली किशोरी, कामिनी और कमला के मारे जानेवाला मामला उसके सामने ही हुआ और तब तक उसे अपनी कार्रवाई करने का कोई मौका न मिला, मगर जब नकली किशोरी, कामिनी और कमला की दाहक्रिया करके राजा साहब आगे बढ़े और दुश्मनों की तरफ से कुछ बेफिक्र हुए, तब लीला को भी अपनी कार्रवाई का मौका मिला और वह उस खेमे के चारों तरफ ज्यादे फेरे लगाने लगी, जिसमें मायारानी कैद थी और चालीस आदमी नंगी तलवार लिये बारी-बारी से उसके चारों ओर पहरा दिया करते थे। एक दिन इत्तिफाक से आँधी-पानी का जोर हो गया और इसीसे उस कमबख्त को अपने काम का अच्छा मौका मिला।

बीरेन्द्रसिंह का लश्कर एक सुहावने जंगल में पड़ा हुआ था। समय बहुत अच्छा था, सन्ध्या होने के पहिले ही से बादलों का शामियाना खड़ा हो गया था, बिजली चमकने लग गयी थी, और हवा के झपेटे पेड़-पत्तों के साथ हाथापाई कर रहे थे। पहर रात जाते-जाते पानी अच्छी तरह बरसने लग गया और उसके बाद तो आँधी-पानी ने एक भयानक तूफान का रूप धारण कर लिया। उस समय लश्करवालों को बहुत ही तकलीफ हुई। हजारों सिपाही, गरीब बनिए, घसियारे और शागिर्द पेशेवाले जो मैदान में सोया करते थे, इस तूफान से दुखी होकर जान बचाने की फिक्र करने लगे। यद्यपि राजा बीरेन्द्रसिह की रहमदिली और रिआयापरवरी ने बहुतों को आराम दिया और बहुत से आदमी खेमों और शामियानों के अन्दर घुस गये, यहाँ तक कि राजा बीरेन्द्रसिंह और तेज सिंह के खेमों से भी सैकड़ों को पनाह मिल गयी, मगर फिर भी हजारों आदमी ऐसे रह गये थे, जिनकी भूँडी किस्मत में दुख भोगना बदा था। यह सबकुछ था, मगर लीला को ऐसे समय भी चैन था और वह दुःख को दुःख नहीं समझती थी, क्योंकि उसे अपना काम साधने के लिए बहुत दिनों बाद आज यही एक मौका अच्छा मालूम हुआ।

जिस खेमे में मायारानी और दारोगा बगैरह कैद थे, उससे चालीस या पचास हाथ की दूरी पर सलई का एक बड़ा और पुराना दरख्त था। इस आँधी-पानी और तूफान का खौफ न करके लीला उसी पेड़ पर चढ़ गयी और कैदियों के खेमें की तरह मुँह करके तिलिस्मी तमंचे का निशाना साधने लगी। जब-जब बिजली चमकती, तब-तब वह अपने निशाने को ठीक करने का उद्योग करती। सम्भव था कि बिजली की चमक में कोई उसे पेड़ पर चढ़ा हुआ देख लेता, मगर जिन सिपाहियों के पहरे में वह खेमा था, उस (कैदियोंवाले) खेमें के आस-पास जो लोग रहते थे, सभी इस तूफान से घबड़ाकर उसी खेमे के अन्दर घुस गये थे, जिसमें मायारानी और दारोगा बगैरह कैद थे। खेमे के बाहर या उस पेड़ के पास कोई भी न था, जिस पर लीला चढ़ी हुई थी।

लीला जब अपने निशाने को ठीक कर चुकी, तब उसने एक गोली (बेहोशी बाली) चलायी। हम पहिले के किसी बयान में लिख चुके हैं कि इस तिलिस्मी तमंचे के चलाने में किसी तरह की आवाज नहीं होती थी, मगर जब गोली जमीन पर गिरती थी, तब कुछ हल्की सी आवाज पटाखे की तरह होती थी।

लीला की चलायी हुई गोली खेमे के छेद के अन्दर चली गयी और एक सिपाही के बदन पर गिरकर फूटी। उस सिपाही का कुछ नुकसान नहीं हुआ, जिस पर गोली गिरी थी। न तो उसका कोई अंग-भंग हुआ और न कपड़ा जला, केवल हलकी-सी आवाज हुई और बहोशी का बहुत ज्यादे धुआँ चारों तरफ फैलने लगा। मायारानी उस वक्त बैठी हुई अपनी किस्मत पर रो रही थी। पटाके की आवाज से वह चौंककर उसी तरफ देखने लगी और बहुद जल्द समझ गयी कि यह उसी तिलिस्मी तमंचे से चलायी गयी गोली है, जो मैं लीला के सुपुर्द कर आयी थी।

मायारानी यद्यपि जान से हाथ धो बैठी थी और उसे विश्वास हो गया था कि अब इस कैद से किसी तरह छुटकारा नहीं मिल सकता, मगर इस समय तिलिस्मी तमंचे की गोली ने खेमे के अन्दर पहुँचकर उसे विश्वास दिला दिया कि अब भी तेरा एक दोस्त मदद करने लायक मौजूद है, जो यहाँ आ पहुँचा और कैद से छुड़ाया ही चाहता है।

वह मायारानी, जिसकी आँखों के आगे मौत की भयानक सूरत घूम रही थी और हर तरह से नाउम्मीद हो चुकी थी, चौंककर सम्हल बैठी। बेहोशी का असर करनेवाला धुआँ बच रहने की मुबारकबाद देता हुआ आँखों के सामने फैलने लगा और तरह-तरह की उम्मीदों ने उसका कलेजा ऊँचा कर दिया। यद्यपि वह जानती थी कि यह धुआँ मुझे भी बेहोश कर देगा, मगर फिर भी वह खुशी की निगाहों से चारों तरफ देखने लगी और इतने में ही एक दूसरी गोली भी उसी ढंग की वहाँ आकर गिरी।

मायारानी और दारोगा को छोड़कर जितने आदमी उस खेमे में थे सभों को उन दोनों गोलियों ने ताज्जुब में डाल दिया। अगर गोली चलाते समय तमंचे में से किसी तरह की आवाज निकलकर उनके कानों तक पहुँचती तो शायद कुछ पता लगाने की नियत से दो-चार आदमी खेमे से बाहर निकलते मगर उस समय सिवाय एक-दूसरे का मुँह देखने के किसी को किसी तरह का गुमान न हुआ और धुएँ ने तेजी के साथ फैलकर अपना असर जमाना शुरु कर दिया। बात-की-बात मे, जितने आदमी उस खेमे के अन्दर थे, सभों का सर घूमने लगा और एक-दूसरे के ऊपर गिरते हुए सब-के-सब बेहोश हो गये, मायारानी और दारोगा को भी दीन-दुनिया की सुध न रही।

पेड़ पर चढ़ी हुई लीला ने थोड़ी देर तक इन्तजार किया। जब खेमे के अन्दर से किसी को निकलते न देखा और उसे विश्वास हो गया कि खेमे के अन्दरवाले अब बेहोश हो गये होंगे, तब वह पेड़ से उतरी और खेमे के पास आयी। आँधी-पानी का जोर अभी तक वैसा ही था, मगर लीला ने इसे अच्छी तरह सह लिया और कनात के नीचे से झाँककर खेमे के अन्दर देखा तो सभों को बेहोश पाया।

पाठकों को यह मालूम है कि लीला ऐयारी भी जानती थी। कनात काटकर वह खेमे के अन्दर चली गयी। आदमी बहुत ज्यादे भरे हुए थे, इसलिए मायारानी के पास तक पहुँचने में बड़ी कठिनाई हुई, आखिर उसके पास पहुँची और हाथ-पैर खोलने के बाद लखलखा सुँघाकर होश में लायी। मायारानी ने होश में आकर लीला को देखा और धीरे-से कहा' ‘शाबाश, खूब पहुँची। बस दारोगा को छुड़ाने की कोई जरूरत नहीं।" इतना कहकर मायारानी उठ खड़ी हुई और लीला के हाथ का सहारा लेती हुई खेमे के बाहर निकल गयी।

लीला ने चाहा कि लश्कर में से दो घोड़े भी सवारी के लिए चुरा लावे, मगर मायारानी ने स्वीकार न किया और उसी तूफान में दोनों कमबख्तों ने एक तरफ का रास्ता लिया।

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