शेरशाह सूरी - सुधीर निगम Shershah Suri - Hindi book by - Sudhir Nigam
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शेरशाह सूरी

सुधीर निगम


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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :79
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 10546
आईएसबीएन :9781610000000

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अपनी वीरता, अदम्य साहस के बल पर दिल्ली के सिंहासन पर कब्जा जमाने वाले इस राष्ट्रीय चरित्र की कहानी, पढ़िए-शब्द संख्या 12 हजार...


कैसे चलता था प्रशासन ?

मुगल शासक बाबर और हुमाऊं से अधिक भूभाग पर शेरशाह का शासन था। उसके राज्य की सीमा पूर्व में सुनारगांव से लेकर पश्चिम में नरवर क्षेत्र तक, उत्तर में झेलम के किनारे स्थित बालनाथ जोगी तक और दक्षिण पश्चिम में 100 मील की दूर पर स्थित खुशाव तक और झेलम के पार किनारे-किनारे भक्खर तक गई थीं। अफगान सरदारों ने शेरशाह को सिंध समर्पित कर दिया था किंतु जैसलमेर का रेगिस्तानी इलाका और बीकानेर व जोधपुर के कुछ हिस्से सूर शासन के अधिकार से बाहर थे। इसके अतिरिक्त पूरा मालवा, राजपूताना और कालिंजर उसके नियंत्रण में थे।

इतने बड़े भू-भाग का समेकन करना और उसका प्रशासन चलाना जबकि संचार के उन्न्त साधन न थे, आसान काम नहीं था। शेरशाह का राज्य केन्द्रीकृत निरंकुशता का था जिसमें अफगान परम्पराओं के दर्शन तो होते हैं पर वास्तव में वह तुर्की विशेषताओं वाला था। शेरशाह ने अफगान साम्राज्य को पुनर्जिवित करने के लिए घोर परिश्रम किया।

उसके राज्य में वजीर के पद की या मंत्रियों या विभागाध्यक्षों के पदों के सृजन की कोई सूचना उपलब्ध नहीं है। पांच साल की अवधि में, जो उसे मिली, संपूर्ण तंत्र की कायापलट करना संभव भी नहीं था। पिता की जागीर के प्रबंधक के रूप में गांवों और परगनों के प्रशासन का पर्याप्त अनुभव होने के कारण शेरशाह ने सबसे पहले छोटे स्तर के प्रशासनिक ढांचे में सुधार के काम को हाथ लगाया। प्रशासन की सबसे छोटी इकाई गांव थी जिसमें एक पटवारी (लेखपाल) और एक मुकद्दम (मुखिया) होता था। पटवारी किसानों और उनकी जोतों के बारे में अभिलेख रखता और मुकद्दम अपने अधिकार क्षेत्र में रहने वाली जनता से राजस्व वसूल कर शासन को सौंप देता था।

परगनों (प्रांतों) के शीर्षस्थ अधिकारी, कहीं हकीम या कहीं अमीन या कहीं फौजदार कहलाते थे। उनके अधिकार समान नहीं थे। इन्हें एक लाख से पांच हजार तक की फौज रखने और जागीरें बांटने का अधिकार था। उप प्रभागों को इक्ता कहा जाता था और ये मुगलकालीन सूबों जैसे ही थे। इक्ते भी सरकारों और परगनों में बंटे हुए थे और इनकी सबसे छोटी इकाई गांव थी। सरकार के स्तर पर सिकंदर-ए-शिकदारान और मुसिफे-ए-मुंसिफान होते थे। मुख्य शिकदर सामान्यतः सैनिक योग्यता रखने वाला अधिकारी होता था। उसके पास फौजी टुकडियां होती थीं और वह कानून व्यवस्था को लागू करने वाला होता था। वह नागरिक प्रशासन का प्रभारी होता था और उसे फौजदारी मामले निपटाने पड़ते थे। अपराधी को पेश करने की जिम्मेदारी मुकद्दम की होती थी। सदर मुंसिफ मालगुजारी और दीवानी के मामले निपटाता था। इनकी सुनवाई के लिए वह दौरे भी करता था। शिकदरों और मुंसिफों की सहायता के लिए एक कारकुन (राजस्व लिपिक) होता था। जो कर एकत्र होता था उसे फोतदार (खजानादार) के पास जमा कराया जाता था।

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