शेरशाह सूरी - सुधीर निगम Shershah Suri - Hindi book by - Sudhir Nigam
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जीवनी/आत्मकथा >> शेरशाह सूरी

शेरशाह सूरी

सुधीर निगम


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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :79
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 10546
आईएसबीएन :9781610000000

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अपनी वीरता, अदम्य साहस के बल पर दिल्ली के सिंहासन पर कब्जा जमाने वाले इस राष्ट्रीय चरित्र की कहानी, पढ़िए-शब्द संख्या 12 हजार...


बादशाह का सपना

शेरशाह जब बिहार का शासक था तब वह प्रायः रात को बाजारों में घूमा करता था और सोए हुए गरीब दरवेशों के सिरहाने वस्त्र और धन रख दिया करता था। एक रात जब वह एक दरवेश के सिरहाने कुछ रख रहा था तब वह दरवेश स्वप्न में अचानक बड़बड़ा उठा, ‘‘खुदा की मेहरबानी देखो उसने दिल्ली के बादशाह को हमारी मदद के लिए भेजा है।’’ शेरशाह इस कथन को दैवी वाक्य मानकर उसे अपनी पे्ररणा और आदर्श मानने लगा। उसी दिन से वह दिल्ली का बादशाह बनने का सपना देखने लगा।

लुटेरा
अपने जीवन के प्रारंभिक दिनों में शेरशाह प्रतिदिन अपना धनुष बाण लेकर 32 मील तक पैदल शिकार के लिए जाया करता था। इस मृगया-प्रसंग में एक दिन वह डाकुओं के दल में फंस गया। जान बचाने के लिए वह उनके दल में मिल गया और लूटमार करने लगा। एक दिन वह अपने साथी डाकुओं के साथ नदी पार कर रहा था उसी समय डाकुओं के एक अन्य दल ने पहले दल पर हमला कर दिया। दोनों में भीषण मुठभेड़ हुई। अंत में शेरशाह का दल पराजित हो गया। शेरशाह निराश होकर अपना धनुष और तरकश सिर पर रखकर नदी में कूद पड़ा। 6 मील तैरकर अपने प्राणों की रक्षा की। उसके बाद उसने लूटमार का काम छोड़ दिया।

बालू के बोरे
जोधपुर पर आक्रमण करने से पूर्व शेरशाह ने अपनी सेना को आदेश दिया कि वे युद्ध-क्रम में प्रस्थान करते हुए अपने पड़ाव पर मिट्टी की रक्षा पंक्तियां खड़ी करें। मार्ग में सेना ने एक दिन रेत के मैदान में पड़ाव डाला। भरसक प्रयत्न करने पर भी अफगान सैनिक अपने पड़ाव के चारो ओर रक्षा पंक्तियां (दीवारें) न बना सके। शेरशाह ने प्रत्येक संभव विधि पर विचार किया पर रक्षा पंक्ति बनाने का कोई उपाय न सूझा। तभी उसके पौत्र महमूद खान ने सुझाव दिया, ‘‘यदि हम बोरे में बालू भर लें और एक दूसरे पर रखकर उसकी दीवारें बना लें तो रक्षा पंक्तियां बन सकती हैं।’’ सभी ने बालक की बुद्धि की प्रशंसा की। देखते-देखते रक्षा पंक्तियां तैयार हो गईं।

मातृ भाषा-प्रेम
शेरशाह अपने सैनिकों और कर्मचारियों से व्यक्तिगत रूप से वार्ता करता था। इस क्रम में पुराने सैनिकों का निरीक्षण करता और नए भरती सैनिकों का हालचाल लेता। अफगानों से उनकी मातृ-भाषा में बातचीत करता। यदि कोई अफगान अफगानी भाषा में ठीक उत्तर न देता तो उसे एक तीर छोड़ने के लिए कहता। यदि उसका तीर ठीक निशाने पर लगता तो वह उसके वेतन में पर्याप्त वृद्धि कर देता। वह कहा करता कि अफगान भाषा उसके लिए एक मित्र और सहायक का काम करती है।

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