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धर्म एवं दर्शन >> हमारे पूज्य देवी-देवता

हमारे पूज्य देवी-देवता

स्वामी अवधेशानन्द गिरि

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2013
पृष्ठ :207
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 15402
आईएसबीएन :9788131010860

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’देवता’ का अर्थ दिव्य गुणों से संपन्न महान व्यक्तित्वों से है। जो सदा, बिना किसी अपेक्षा के सभी को देता है, उसे भी ’देवता’ कहा जाता है...

छिन्नमस्ता

परिवर्तन जगत का अधिपति कबंध है और उसकी शक्ति ही छिन्नमस्ता है। संपूर्ण विश्व की वृद्धि और ह्रास तो सदैव होता रहता है। जब हास की मात्रा कम और विकास की मात्रा अधिक होती है तब भुवनेश्वरी का प्राकट्य होता है। इसके विपरीत जब निर्गम अधिक और आगम कम होता है तब भगवती छिन्नमस्ता का प्राधान्य होता है।

भगवती छिन्नमस्ता का स्वरूप अत्यंत गोपनीय है। इसे कोई अधिकारी साधक ही जान सकता है। दस महाविद्याओं में इनका तीसरा स्थान है। इनके प्रादुर्भाव की कथा इस प्रकार है- एक बार भगवती भवानी अपनी सहचरी जया और विजया के साथ मंदाकिनी में स्नान करने के लिए गईं। स्नानोपरांत क्षुधाग्नि से पीडित होकर वे कृष्ण वर्ण की हो गईं। उस समय उनकी सहचरियों ने भी उनसे कुछ भोजन करने के लिए मांगा। देवी ने उनसे कुछ समय प्रतीक्षा करने के लिए कहा। थोड़ी देर बाद सहचरियों ने जब पुनः भोजन के लिए निवेदन किया तब देवी ने उनसे कुछ देर और प्रतीक्षा करने के लिए कहा।

इस पर सहचरियों ने देवी से विनम्र स्वर में कहा कि मां तो अपने शिशुओं को भूख लगने पर अविलंब भोजन प्रदान करती है। आप हमारी उपेक्षा क्यों कर रही हैं? अपनी सहचरियों के मधुर वचन सुनकर कृपामयी देवी ने अपने खड्ग से अपना ही सिर काट दिया। कटा हुआ सिर देवी के बाएं हाथ में आ गिरा और उनके कबंध से रक्त की तीन धाराएं प्रवाहित हो गईं। दो धाराओं को उन्होंने अपनी दोनों सहचरियों की ओर प्रवाहित कर दिया। जिसे पीती हुई दोनों प्रसन्न होने लगीं और तीसरी धारा से देवी स्वयं ही पान करने लगीं। तभी से ये देवी ‘छिन्नमस्ता' के नाम से प्रसिद्ध हुईं।

ऐसा विधान है कि आधी रात में छिन्नमस्ता की उपासना से साधक को सरस्वती सिद्ध हो जाती हैं। शत्रु विजय, समूह स्तंभन, राज्य प्राप्ति और दुर्लभ मोक्ष की प्राप्ति के लिए भगवती छिन्नमस्ता की उपासना अमोघ है। छिन्नमस्ता का आध्यात्मिक स्वरूप अत्यंत महत्वपूर्ण है। छिन्न यज्ञशीर्ष की प्रतीक ये देवी श्वेत कमल-पीठ पर खड़ी हुई हैं। दिशाएं ही इनके वस्त्र हैं। ये अपना शीश काटकर भी जीवित हैं। ये अपने-आपमें पूर्ण अंतर्मुखी साधना का संकेत है।

अनेक विद्वानों ने इस रूपक को सिद्धि की चरम सीमा का संकेत माना है। योग शास्त्र में तीन ग्रंथियां बताई गई हैं जिनके भेदन के बाद योगी को पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है। योगियों का अनुभव है कि मणिपूर चक्र के नीचे की नाड़ियों में ही काम और रति का मूल है, उसी पर महाविद्या छिन्नमस्ता आरूढ़ हैं। इनका ऊर्ध्व प्रवाह होने पर रुद्र ग्रंथि का भेदन होता है।

छिन्नमस्ता का वज्र वैरोचनी नाम शाक्तों, बौद्धों तथा जैनों में समान रूप से प्रचलित है। देवी की दोनों सहचरियां रजोगुण तथा तमोगुण की प्रतीक हैं। कमल विश्वप्रपंच है और काम-रति चिदानंद की स्थूलवृत्ति है। बृहदारण्यक की अश्वशिर विद्या, शाक्तों की हयग्रीव विद्या तथा गाणपत्यों के छिन्नशीर्ष गणपति का रहस्य भी छिन्नमस्ता से संबंधित हैं। हिरण्यकशिपु, वैरोचन आदि छिन्नमस्ता के ही उपासक थे, अतः इन्हें 'वज्र वैरोचनीया' कहा गया है। वैरोचन अग्नि को कहते हैं। अग्नि के स्थान मणिपूर में छिन्नमस्ता का ध्यान किया जाता है।

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