सभी आयुवर्ग के पाठकों के लिये प्रेरक एवं मार्गदर्शक कहानियों का अनुपम संग्रह

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प्रेरक कहानियाँ

डॉ. ओम प्रकाश विश्वकर्मा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :240
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15422
आईएसबीएन :978-1-61301-681-7

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सभी आयुवर्ग के पाठकों के लिये प्रेरक एवं मार्गदर्शक कहानियों का अनुपम संग्रह

परिश्रम का सुफल

महर्षि अत्रि अपनी तपस्या के लिए प्रसिद्ध थे। इतना होने पर भी मन ही मन उनको एक चिन्ता खाये जाती थी। उनकी चिन्ता का विषय थी उनकी विवाहित-कन्या अपाला। क्योंकि अपाला चर्मरोगिणी थी, जिसके कारण उसके पति ने उसको त्याग दिया था और वह अपने पिता के आश्रम में ही रह रही थी।

महर्षि अत्रि ने अनेक प्रकार से अपनी कन्या के रोगनिवारण के उपाय किये, उपचार किये किन्तु सब निष्फल सिद्ध हुए। कन्या का रोग दूर नहीं हुआ। निराश होकर अपाला स्वयं इन्द्र की शरण में जा पहुँची। उसने बड़ी निष्ठा से इन्द्र की अर्चना उपासना आरम्भ कर दी।

इसी क्रम में एक दिन नित्य की भाँति अपाला नदी-तट पर स्नान के लिए गयी। अपाला के मन में स्फूर्ति थी। वह समझ रही थी कि इन्द्र अवश्य ही उसकी उपासना से प्रसन्न होंगे। उसने स्नान किया और जल का कलश भर कर वापस आ रही थी कि उसको समीप ही सोमलता दिखाई दी। इन्द्र को सोमरस बहुत प्रिय था, यह बात अपाला जानती थी और उसे सहसा ही सोमलता प्राप्त हो गयी थी। उसकी प्रसन्नता का पार नहीं था। अब अपाला को विश्वास हो गया था कि जब वह इन्द्र को सोमरस भेंट करेगी तो इन्द्र उस पर प्रसन्न हो जाएंगे। अपाला ने कठिन तपस्या की थी। सात्विक मन से उसने इन्द्र की उपासना की थी।

अपाला ने कलश रखा और सोमलता का चयन किया। चयन के उपरान्त ज्यों ही वह रस निकाल रही थी उसे सामने किसी दिव्य पुरुष के दर्शन हुए। वे सामने खड़े थे। अपाला उन्हें देखकर अभिभूत-सी हो गयी। उसके मुख से कुछ निकले कि उससे पहले सामने खड़े पुरुष बोल पड़े, "मुझे सोमपान बहुत प्रिय है। इसके लिए मैं स्थान-स्थान पर भटकता रहता हूँ। आज तुम्हारी इस क्रिया से मैं स्वयं ही तुम्हारे पास चला आया हूँ।"

अपाला ने भी वहीं उसी स्थान पर सोमलता का रस निकाल लिया था। रस उसके पात्र में रखा हुआ था।

वह दिव्य पुरुष भी कोई अन्य नहीं अपितु स्वयं इन्द्र महाराज थे। इन्द्र सोमरस पाकर प्रसन्न हुए। उन्होंने अपाला से वर माँगने के लिए कहा। अपाला बोली, "आपका शुभ दर्शन पाना मेरी एकमात्र अभिलाषा थी, उसकी पूर्ति हो गयी है, इससे बढ़ कर अब और मैं क्या वर माँगूं, मेरा यही परम सौभाग्य है।"

इन्द्र बोले, "तुम्हारी उपासना सफल हुई।"

इन्द्र का इतना कहना था कि अपाला का चर्म रोग सहसा विलुप्त हो गया। वह अपने प्राकृतिक वर्ण की हो गयी।

लगन से किया गया परिश्रम कभी निष्फल नहीं जाता।  

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