आचार्य श्रीराम शर्मा >> बोलती दीवारें (सद्वाक्य-संग्रह) बोलती दीवारें (सद्वाक्य-संग्रह)श्रीराम शर्मा आचार्य
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सद् वाक्यों का अनुपम संग्रह
गायत्री माहात्म्य
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बुद्धि को निर्मल, पवित्र एवं उत्कृष्ट बनाने का महामंत्र है- गायत्री मंत्र।
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गायत्री माता का आँचल श्रद्धापूर्वक पकड़ने वाला जीवन में कभी निराश नहीं रहता।
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गायत्री उपासना का अर्थ है- सत्प्रेरणा को इतनी प्रबल बनाना कि सन्मार्ग पर चले बिना रहा ही न जा सके।
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प्रणव (ॐ) का संदेश है-परमात्मा सभी प्राणियों में समाया हुआ है, इसलिए निष्काम भाव से सभी के प्रति समर्पित होकर कर्म करो।
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'भू:' का संदेश है-शरीर अस्थायी औजार मात्र है। उस पर अत्यधिक आसक्त न होकर आत्मबल बढ़ाओ। श्रेष्ठ मार्ग का अनुसरण करो।
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'भुव:' का संदेश है-कुसंस्कारों से जूझता रहने वाला मनुष्य देवत्व को प्राप्त करता है।
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‘स्व:' का संदेश है-विवेक द्वारा शुद्ध बुद्धि से सत्य को जानने, संयम और त्याग की नीति का आचरण करने के लिए अपने को तथा दूसरों को प्रेरणा देनी चाहिए।
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‘तत्' शब्द का संदेश है-वही बुद्धिमान् है, जो जीवन और मरण के रहस्य को जानता है। भय और आसक्ति-रहित जीवन जीता है।
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सवितुः' शब्द का संदेश है-मनुष्य को सूर्य के समान तेजस्वी होना चाहिए और सभी विषय तथा अनुभूतियाँ अपनी आत्मा से ही संबंधित हैं, ऐसा विचारना चाहिए।
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वरेण्यम्' शब्द का संदेश है-प्रत्येक को श्रेष्ठ देखना, श्रेष्ठ चिंतन करना, श्रेष्ठ विचारना, श्रेष्ठ कार्य करना चाहिए। इस प्रकार से मनुष्य श्रेष्ठता को प्राप्त होता है।
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'भर्गो' शब्द का संदेश है-मनुष्य को निष्पाप बनना चाहिए। पापों से सदैव सावधान रहना चाहिए।
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देवस्य' शब्द का संदेश है-देवताओं के समान शुद्ध दृष्टि रखने से परमार्थ कर्म में निरत रहने से मनुष्य के भीतर और बाहर देवलोक की सृष्टि होती है।
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'धीमहि' शब्द का संदेश है-हम सब लोग हृदय में सब प्रकार की पवित्र शक्तियों को धारण करें। इसके बिना मनुष्य सुख-शान्ति को प्राप्त नहीं होता।
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‘धियो' शब्द बतलाता है कि बद्धिमान को चाहिए कि वह उचित-अनुचित का निर्णय तर्क, विवेक और न्याय के आधार पर वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए करे।
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‘यो नः' पद का तात्पर्य है-हमारी जो भी शक्तियाँ एवं साधन हैं, उनके न्यून से न्यून भाग को ही अपनी आवश्यकता के लिए प्रयोग में लाएँ, शेष नि:स्वार्थ भाव से असमर्थों में बाँट दें।
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‘प्रचोदयात्' पद का अर्थ है-मनुष्य अपने आपको तथा दूसरों को सत्य मार्ग पर चलने के लिए प्रेरणा दे।
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गायत्री उपासना सत्प्रेरणा को इतनी प्रबल बनाती है कि सन्मार्ग पर चले बिना रहा ही नहीं जा सकता।
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संसार का सबसे बड़ा बल है 'आत्मबल'। यह गायत्री साधक को प्राप्त होता है।
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अपने व्यक्तित्व को सुसंस्कारित एवं चरित्र को परिष्कृत बनाने वाले साधक को गायत्री महाशक्ति मातृवत् संरक्षण प्रदान करती है।
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नम्रता, सेवा, शील, सदाचार, निरालस्यता, सादगी, धर्म, रुचि एवं परमार्थ-परायणता के तत्त्व गायत्री जप से बढ़ते हैं।
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ब्राह्ममुहूर्त में गायत्री जप करने से चित्त शुद्ध होता है, हृदय में निर्मलता आती है और शरीर नीरोग रहता है।
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गंगा शरीर के पापों को निर्मल करती है और गायत्री रूपी ज्ञान-गंगा से मन निष्कलुष व आत्मा पवित्र होती है।
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समस्त अज्ञानों, अशक्तियों एवं अभावों के कारण होने वाले कष्टों से छुटकारा दिलाता है-गायत्री महामंत्र।
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जब भी जितनी अधिक मात्रा में गायत्री का जप, पूजन, चिंतन, मनन किया जा सके, उतना ही अच्छा है; क्योंकि 'अधिकस्य अधिकं फलम्'।
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गायत्री को इष्ट मानने का अर्थ है- सत्प्रवृत्ति की सर्वोत्कृष्टता पर आस्था।
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भगवती गायत्री अपने शरणागत को दिव्य प्रकाश देती है और सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देकर सुखशान्ति प्रदान करती है।
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