गायत्री साधना क्यों और कैसे - श्रीराम शर्मा आचार्य Gayatri Sadhana Kyon Aur Kaise - Hindi book by - Sriram Sharma Acharya
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गायत्री साधना क्यों और कैसे

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रणय पण्डया

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2020
पृष्ठ :60
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 15490
आईएसबीएन :00000

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गायत्री साधना कैसे करें, जानें....

गायत्री मंत्र के उच्चारण से दिव्य शक्तियों का जागरण


गायत्री महामंत्र की विशेषता का भौतिक कारण इसके अक्षरों का आपसी गुन्थन है, जो स्वर विज्ञान और शब्द शास्त्र के ऐसे रहस्यमय आधार पर हुआ है कि उसके उच्चारण भर से सूक्ष्म शरीर में छिपे हुए अनेकों शक्ति केन्द्र अपने आप जाग्रत् हो उठते हैं। दिव्य दृष्टि वाले ऋषियों के अनुसार सूक्ष्म शरीर में अनेकों चक्र-उपचक्र ग्रंथिया-कोष मातृकायें-उपत्पिकाएँ और सूक्ष्म नाड़ियाँ भरी पड़ी हैं, जिनके जागने पर व्यक्ति अनेकों गुण और शक्तियों का स्वामी बन जाता है।

गायत्री मंत्र के २४ अक्षरों के उच्चारण से मुख, ओष्ठ, कैद, तालू मूर्धा आदि पर जो दबाव पड़ता है, उसके कारण ये केन्द्र वीणा की तार की तरह झंकृत हो उठते हैं और एक ऐसी स्वर लहरी उठती है कि जिसके प्रभाव से अंदर विद्यमान सूक्ष्म ग्रंथियाँ जाग्रत् होकर अपनी शक्ति को प्रकट करने लगती हैं। इस तरह साधक एक चुम्बकीय शक्ति से भरने लगता है, जो ब्रह्माण्ड में फैली गायत्री शक्ति व उसकी धाराओं को खींचकर अंदर भरने लगता है। गायत्री की शक्ति तरंगें रेडियो या दूरदर्शन प्रसारण की विद्युत-चुम्बकीय धाराओं की तरह आकाश में फैली हुई हैं। गायत्री मंत्र के उच्चारण से उत्पन्न चुम्बकत्व साधक के मन को उस स्तर पर 'ट्यून' कर लेता है और उनसे सम्पर्क जोड़ता है। इस तरह जो काम योगी लोग कठोर तप-साधनाओं द्वारा लम्बे समय में पूरा करते हैं, वही काम गायत्री के जप द्वारा थोड़े समय में आसानी से पूरा हो जाता है।

गायत्री मंत्र की शब्द शक्ति के साथ जब व्यक्ति की साधना द्वारा शुद्ध की हुई सूक्ष्म प्रकृति अर्थात् उसका नेक इरादा और श्रेष्ठ सोच भी मिल जाती है, तो ये दोनों कारण गायत्री शक्ति को ऐसी बलवती बनाते हैं कि यह साधकों के लिए दैवी वरदान सिद्ध होती है। गायत्री मंत्र को और भी शक्तिशाली बनाने वाला कारण साधक की श्रद्धा और विश्वास है। विश्वास की शक्ति से सभी परिचित हैं। झाड़ी को -ता, रस्सी को साँप और पत्थर को देवता बना देने की क्षमता विश्वास में है। रामायण में तुलसीदास जी ने 'श्रद्धा-विश्वास' की तुलना भवानी-शंकर से की है।

अत: गायत्री साधक जब श्रद्धा और विश्वास पूर्वक साधना करता है, तो शब्द शक्ति और नेक इरादे से जुड़ा गायत्री साधना का प्रभाव और भी बढ़ जाता है। तथा यह एक अद्‌भुत शक्ति सिद्ध होती है।

गायत्री तीन गुणों वाली शक्ति है। हीं-सद्बुद्धि श्रीं-समृद्धि और क्लीं-शक्ति प्रधान इसकी तीन विशेष धाराए हैं। इन्हें गंगा, यमुना और सरस्वती का त्रिवेणी संगम भी कह सकते हैं। देवशक्तियों से जोड़ने पर इन्हें सरस्वती, लक्ष्मी, काली और ब्रह्मा, विष्णु महेश रूप में जाना जाता है। वेदमाता, देवमाता, विश्वमाता इसी के तीन रूप हैं। गायत्री साधना से जब साधक के मन, बुद्धि और भावनाओं को इस त्रिवेणी में जान करने का अवसर मिलता है, तो स्थिति कायाकल्प जैसी बन जाती है।

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