चन्द्रकान्ता सन्तति - 4 - देवकीनन्दन खत्री Chandrakanta Santati - 4 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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चन्द्रकान्ता सन्तति - 4

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :256
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8402
आईएसबीएन :978-1-61301-029-7

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चन्द्रकान्ता सन्तति - 4 का ई-पुस्तक संस्करण...

तीसरा बयान


शेरअलीखाँ बड़ी इज्जत और आबरू के साथ घर भेजे गये, उनके सेनापति महबूबखाँ को भी छुट्टी मिली, भैरोसिंह मनोरमा की फिक्र में गये, तारासिंह नानक के घर चले और कुछ फौजी सिपाहियों के साथ नकली बलभद्रसिंह, लक्ष्मीदेवी, कमलिनी और लाडिली को लिये हुए इन्द्रदेव ने अपने गुप्त स्थान की तरफ प्रस्थान किया। भूतनाथ बातें करता हुआ, उन्हीं के साथ चल पड़ा और थोड़ी दूर जाने बाद आज्ञा लेकर अपने अड्डे की तरफ रवाना हुआ, जो बराबर की पहाड़ी पर था और देवीसिंह ने न मालूम किधर का रास्ता लिया। राजा बीरेन्द्रसिंह की सवारी भी उसी दिन चुनार गढ़ की तरफ चली और तेजसिंह राजा साहब के साथ गये।

हम सबके पहिले तारासिंह के साथ चलकर नानक के घर पहुँचते हैं और उसकी जगतप्रिय स्त्री की अवस्था पर ध्यान देते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि लड़कपन में नानक उत्साही था और उसे नाम पैदा करने की बड़ी लालसा थी, परन्तु रामभोली के प्रेम ने उसका खयाल बदल दिया और उसमें खुदगर्जी का हिस्सा कुछ ज्यादे हो गया। आखीर में जब उसने श्यामा नामी एक स्त्री से शादी कर ली, जिसका हाल कई दफे लिखा जा चुका है, तब से तो उसकी बुद्धि बिल्कुल ही भ्रष्ट हो गयी। नानक की स्त्री श्यामा बड़ी चतुर, लालची और कुलटा थी, मगर नानक उसे पतिव्रता और साध्वी जानकर माता के समान उसकी इज्जत करता था। नानक के नातेदार और दोस्तों की आमदरफ्त उसके घर में विशेष थी। श्यामा को रुपये पैसे की कमी न थी और वह अपनी दौलत जमीन के अन्दर गाड़कर रक्खा करती थी, जिसका हाल सिवाय एक नौजवान खिदमतगार के जिसका, नाम हनुमान था और कोई भी नहीं जानता था। हनुमान यद्यपि नानक का नौकर था, परन्तु इस सबब से कि उसकी माँ कुछ दिनों तक भूतनाथ की खिदमत में रह चुकी थी, वह अपने को नौकर नहीं समझता था, बल्कि घर का मालीक समझता था। नानक की स्त्री उसे बहुत चाहती थी, यहाँ तक कि एक दिन उसने अपने मुँह से उसे अपना देवर स्वीकार किया था, इस सबब से वह और भी सिर चढ़ गया था। नानक के यहाँ एक मजदूरनी भी थी, वह नानक के काम की चाहे न हो, मगर उसकी स्त्री के लिए उपयोगी पात्र थी और उसके द्वारा नानक की स्त्री का बहुत काम निकलता था।

तारासिंह अपने दो चेलों को साथ लिये रोहतासगढ़ से रवाना होकर भेष बदले हुए तीसरे ही दिन नानक के घर पहुँचा। ठीक दोपहर का समय था और नानक अपने किसी दोस्त के यहाँ गया हुआ था, मगर उसका प्यारा खिदमतगार हनुमान दरवाजे पर बैठा, अपने पड़ोसी साईयों और कोचवानों के साथ गप्पें लड़ा रहा था। तारासिंह थोड़ी देर तक इधर-उधर टहलता और टोह लेता रहा। जब उसे मालूम हो गया कि हनुमान नानक का प्यारा नौकर है, और उम्र में भी अपने से बड़ा नहीं है तो वहाँ से लौटा और कुछ दूर जाकर किसी सूनसान अँधेरी गली में मकान किराये पर लेने का बन्दोबस्त करने लगा। सन्ध्या होने के पहिले ही इसी काम से भी निश्चिन्ती हो गयी, अर्थात् उसने एक बहुत बड़ा मकान किराये पर ले लिया जो मुद्दत से खाली पड़ा हुआ था, क्योंकि लोग उसमें भूत-प्रेतों का वास समझते थे और कोई उसमें रहना पसन्द नहीं करता था। उसमें जाने के लिए तीन रास्ते थे और उसके अन्दर कई कोठरियाँ ऐसी थीं कि यदि उसमें किसी को बन्द कर दिया जाये तो हजार चिल्लाने और ऊधम मचाने पर भी किसी बाहरवाले को खबर न हो। तारासिंह ने उसी मकान में डेरा जमाया और बाजार जाकर दो ही घण्टे में वे सब चीजें खरीद लाया, जिनकी उसने जरूरत समझी और जो एक अमीराना ढंग से रहने वाले आदमी के लिए आवश्यक थीं। इस काम से भी छुट्टी पाकर उसने मोमबत्ती जलायी और आईना तथा ऐयारी का बटुआ सामने रखकर अपनी सूरत बदलने का उद्योग करने लगा। शीघ्र ही एक खूबसूरत नौजवान अमीर की सूरत बनाकर वह घर से बाहर निकला और मकान में एक चेले को छोड़कर नानक के घर की तरफ रवाना हुआ। दूसरा चेला जो तारासिंह के साथ था, उसे बहुत सी बातें समझाकर दूसरे काम के लिए भेजा।

जब तारासिंह नानक के मकान पर पहुँचा तो उसने हनुमान को दरवाजे पर बैठा पाया। इस समय हनुमान अकेला था और हुक्का पीने का बन्दोबस्त कर रहा था। उसके पास ही ताक (आला) पर एक चिराग जल रहा था, जिसकी रोशनी चारों तरफ फैल रही थी। तारासिंह हनुमान के पास जाकर खड़ा हो गया था। हनुमान ने बड़े गौर से उसकी सूरत देखी और रोब में आकर हुक्का छोड़के खड़ा हो गया। उस समय चिराग की रोशनी में तारासिंह बड़े शान-शौकत का आदमी मालूम पड़ रहा था। खूबसूरती बनाने की तारासिंह को जरूरत न थी, क्योंकि वह स्वयं खूबसूरत और नौजवान आदमी था, परन्तु रूप बदलने की नीयत से उसने अपने चेहरे पर रोगन जरूर लगाया था, जिससे वह इस समय और भी खूबसूरत और शौकीन जँच रहा था।

तारासिंह को देखते ही हनुमान उठ खड़ हुआ और हाथ जोड़कर बोला, ‘‘हुक्म!’’

तारा : हमारे साथ एक नौकर था, वह राह भूलकर न मालूम कहाँ चला गया, उम्मीद थी कि वह हमको ढूँढ़ने के बाद सीधा घर पर चला जायगा, मगर इस समय प्यास के मारे हमारे गला सूखा जा रहा है।

हनुमान : (एक छोटी चौकी की तरफ इशारा करके) सरकार इस चौकी पर बैठ जाँय, मैं अभी पानी लाता हूँ।

इतना सुनकर तारासिंह चौकी पर बैठ गया और हनुमान पानी लाने के लिए अन्दर चला गया। थोड़ी देर में पानी का भरा हुआ एक लोटा और गिलास लिये हुए हनुमान बाहर आया और तारासिंह को पीने के लिए पानी गिलास में डालकर दिया, उसी समय तारासिंह ने दरवाजे का पर्दा हिलते हुए देखा और यह भी मालूम किया कि कोई औरत भीतर से झाँक रही है। पानी पीने के बाद तारासिंह ने पाँच रुपये हनुमान के हाथ में दिये और वहाँ से उठकर दूसरी तरफ का रास्ता लिया।

हनुमान केवल एक गिलास पानी पिलाने के बदले में पाँच रुपये पाकर बड़ा ही प्रसन्न हुआ, और दाता की अमीरी पर आश्चर्य करने लगा। उसे विश्वास हो गया कि यह कोई बड़ा भारी अमीर आदमी या कोई राजकुमार है और साथ ही दिल का अमीर तथा जी खोलकर देनेवाला भी है।

दूसरे दिन सन्ध्या के पहिले ही हनुमान ने तारासिंह को अपने दरवाजे के सामने से जाते देखा और उसके साथ एक नौकर को भी देखा, जो बड़े शान के साथ कीमती कपड़े पहिरे और तलवार लगाये तारासिंह के पीछे-पीछे जा रहा था। हनुमान ने उठकर तारासिंह को बड़े अदब के साथ सलाम किया तारासिंह ने अपने नौकर को जो वास्तव में उसका चेला था कुछ कहकर हनुमान के पास छोड़ा और आगे का रास्ता लिया।

तारासिंह के नौकर में और हनुमान में दो घण्टे तक खूब बातचीत हुई, जिसे हम यहाँ लिखना नापसन्द करते हैं। हाँ, इस बातचीत का जो कुछ नतीजा निकला वह अवश्य दिखाया जायगा, क्योंकि नानक के घर की जाँच करने ही के लिए तारासिंह का आना इस शहर में हुआ था।

बहुत देर तक बातचीत करने बाद तारासिंह का नौकर उठ खड़ा हुआ और हनुमान के हाथ में कुछ देकर घर का रास्ता लिया, जहाँ तारासिंह उसके आने का इन्तजार कर रहा था। जब तारासिंह ने नौकर को आते देखा तो पूछा–

तारा : कहो क्या हुआ?

नौकर : सब ठीक है, वह तो आपको देख भी चुकी है।

तारा : हाँ रात को जब मैं वहाँ पानी पी रहा था, टाट का पर्दा हिलते हुए देखा था तो और भी कुछ हालचाल मालूम हुआ?

नौकर : जी हाँ, बड़ी-बड़ी बाते मालूम हुईं। वह तो पूरी खानगी है, कल दोपहर के पहिले मैं आपको उन लोगों के नाम भी बतलाऊँगा, जिनसे उसका ताल्लुक है और उम्मीद है कि कल वह स्वयं बन-ठनकर आपके पास आये।

तारा : ठीक है, तो क्या तुम्हें उसका नाम भी मालूम हुआ?

नौकर : जी हाँ, उसका नाम श्यामा है और अपने पति अर्थात् नानक के लिए तो वह रूपगर्विता नायिका है।

तारा : बड़े अफसोस की बात है। निःसन्देह भूतनाथ के लिए यह एक कलंक है। ऐसी औरत का पति इस योग्य नहीं कि हम लोग उसे अपने पास बैठावें या उसका पानी पीये। खैर, तुम घर में बैठो मैं गश्त लगाने के लिए जाता हूँ।

दूसरे दिन दोपहर के समय तारासिंह का वही नौकर नानक के घर से निकला तथा इधर-उधर घूमता-फिरता तारासिंह के पास आया और बोला, ‘आज श्यामा के कई प्रेमियों के नाम मैं लिख लाया हूँ।’’

तारा : अच्छा बताओ तो सही शायद उन लोगों में से किसी को मैं जानता होऊँ या किसी का नाम भी सुना हो।

नौकर : श्यामा के एक प्रेमी का नाम जलशायी बाबू है।

तारा : (गौर करके) जलशायी बाबू को तो मैं जानता हूँ, वे तो बड़े नेक और बुद्धिमान हैं।

नौकर : जी हाँ, वही लम्बे और गोरे से, वे तरह-तरह के कपड़े राजधानी से लाकर उसे दिया करते हैं, और दूसरे प्रेमी का नाम त्रिभुवन नायक है और उन्हें महत्त्व की पदवी भी है, और तीसरे प्रेमी का नाम मायाप्रसाद है, जो राजा साहब के कोषाध्यक्ष हैं, और चौथें प्रेमी का नाम आनन्दवन बिहारी है, और पाँचवें...

तारा : बस बस बस, मैं विशेष नाम सुनना पसन्द नहीं करता।

नौकर : जो हुक्म, (एक कागज दिखाकर) मैं तो पचीसों नाम लिख लाया हूँ।

तारा : ठीक है, तुम इस फिहरिस्त को अपने पास रक्खो, आवश्यकता पड़ने पर महाराज को दिखायी जायगी, हमारा काम तो उसके आज यहाँ आ जाने से ही निकल जायगा।

नौकर : जी हाँ, आज वह यहाँ जरूर आवेगी, हनुमान मेरे साथ आकर घर देख गया है।

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