चन्द्रकान्ता सन्तति - 4 - देवकीनन्दन खत्री Chandrakanta Santati - 4 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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चन्द्रकान्ता सन्तति - 4

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :256
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8402
आईएसबीएन :978-1-61301-029-7

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चन्द्रकान्ता सन्तति - 4 का ई-पुस्तक संस्करण...

छठवाँ बयान


जिस राह से कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को राजा गोपालसिंह इस बाग में लाये थे, उसी राह से जाकर ये दोनों भाई उस कमरे में पहुँचे, जो कि बाजेवाले कमरे में जाने के पहिले पड़ता था, और जिसमें महराबदार चार खम्भों के सहारे एक बनावटी आदमी फाँसी लटक रहा था। इस कमरे का खुलासा हाल एक दफे लिखा जा चुका है, इसलिए यहाँ पुनः लिखने की कोई आवश्यकता नहीं जान पड़ती। पाठकों को यह भी याद होगा कि इन्दिरा का किस्सा सुनने के पहिले ही कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह उस तिलिस्मी बाजें की आवाज ताली देकर अच्छी तरह सुन-समझ चुकें हैं। यदि याद न हो तो तिलिस्म सम्बन्धी पिछला किस्सा पुनः पढ़ जाना चाहिए, क्योंकि अब ये दोनों भाई तिलिस्म तोड़ने में हाथ लगाते हैं।

कमरे में पहुँचने के बाद दोनों भाइयों ने देखा कि फाँसी लटकते हुए आदमी के नीचे जो मूरत (इन्दिरा के ढँग की) खड़ी थी, वह इस समय तेजी के साथ नाच रही है। कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने तिलिस्मी खंजर का एक वार करके उस मूरत को दो टुकड़े कर दिया, अर्थात् कमर के ऊपरवाला हिस्सा काटकर गिरा दिया। उसी समय उस मूरत का नाचना बन्द हो गया, और वह भयानक आवाज भी जो बड़ी देर से तमाम बाग में और इस कमरे में भी गूँज रही थी, एकदम बन्द हो गयी। इसके बाद दोनों भाइयों ने उस बची हुई आधी मूरत को जोर करके जमीन से उखाड़ डाला। उस समय मालूम हुआ कि उसके दाहिने पैर के तलवे में लोहे की एक जंजीर जड़ी है, इसके खींचने से दाहिनी तरफ वाली दीवार में एक नया दरवाजा निकल आया।

तिलिस्मी खंजर की रोशनी के सहारे दोनों भाई उस नये दरवाजे के अन्दर चले गये थोड़ी दूर जाने बाद और एक खुला हुआ दरवाजा लाँघकर एक छोटी सी कोठरी में पहुँचे, जिसके ऊपर चढ़ जाने के लिए दस-बारह सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। दोनों भाई सीढ़ियों पर चढ़कर ऊपर के कमरे में पहुँचे, जिसकी लम्बाई पचास हाथ और चौड़ाई चालीस हाथ से कम न होगी। यह कमरा काहे को था, एक छोटा सा बनावटी बगीचा मन मोहने वाला था। यद्यपि इसमें फूल-बूटों के जितने पेड़ लगे हुए थे, सब बनावटी थे, मगर फिर भी जान पड़ता था कि फूलों की खुशबू से वह कमरा अच्छी तरह बसा हुआ है। इस कमरे की छत में बहुत मोटे-मोटे शीशे लगे हुए थे, जिसमें से बेरोक-टोक पहुँचनेवाली रोशनी के कारण कमरे-भर में उजाला हो रहा था वे शीशे चौड़ें या चिपटे न थे, बल्कि गोल गुम्बज की तरह बने हुए थे।

इस छोटे बनावटी बागीचे में छोटी-छोटी मगर बहुत खूबसूरत क्यारियाँ बनी हुई थीं और उन क्यारियों के चारों तरफ की जमीन पत्थर के छोटे-छोटे रंग-बिरंगे टुकड़ों से बनी हुई थी। बीच में एक गोलाम्बर (चबूतरा) बना हुआ था, और उसके ऊपर एक औरत खड़ी हुई मालूम पड़ती थी, जिसके बायें हाथ में एक तलवार और दाहिने में हाथ-भर लम्बी एक ताली थी।

कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने तिलिस्मी खंजर की रोशनी बन्द करके आनन्दसिंह की तरफ देखा और कहा, ‘‘यह औरत निःसन्देह लोहे या पीतल की बनी हुई होगी और यह ताली भी वही होगी, जिसकी हम लोगों को जरूरत है, मगर तिलिस्मी बाजें ने तो यह कहा था कि ताली किसी चलती-फिरती से प्राप्त करोगे,’ यह औरत तो चलती-फिरती नहीं है, खड़ी है!’’

आनन्द : उसके पास तो चलिए, देखें वह ताली कैसी है।

इन्द्रजीत : चलो।

दोनों भाई उस गोलाम्बर की तरफ बढ़े, मगर उसके पास न जा सके तीन-चार हाथ इधर ही थे कि एक प्रकार की आवाज के साथ वहाँ की जमीन हिली और गोलाम्बर (जिस पर पुतली थी) तेजी से चक्कर खाने लगा और उसी के साथ वह नकली औरत (पुतली) भी घूमने लगी, जिसके हाथ में तलवार और ताली थी। घूमने के समय उसका तालीवाला हाथ ऊँचा हो गया और तलवार वाला हाथ आगे की तरफ बढ़ गया, जो उसके चक्कर की तेजी में चक्र का काम कर रहा था।

आनन्द : कहिए भाई जी, अब यह औरत या पुतली चलती-फिरती हो गयी या नहीं?

इन्द्रजीत : हाँ, हो तो गयी।

आनन्द : अब जिस तरह हो सके, इसके साथ से ताली ले लेनी चाहिए, गोलाम्बर पर जाने वाला तो तुरन्त दो टुकड़े हो जायगा।

इन्द्रजीत : (पीछे हटते हुए) देखें हट जाने पर इसका घूमना बन्द होता है, या नहीं।

आनन्द : (पीछे हटकर) देखिए गोलाम्बर का घूमना बन्द हो गया। बस यही काला पत्थर चार हाथ के लगभग चौड़ा, जो इस गोलाम्बर के चारों तरफ लगा है, असल करामात है, इस पर पैर रखने ही से गोलाम्बर घूमने लगता है। (काले पत्थर के ऊपर जाकर) देखिए घूमने लग गया, (हटकर) अब बन्द हो गया। अब समझ गया, इस पुतली के हाथ से ताली और तलवार ले लेना कोई बड़ी बात नहीं।

इतना कहकर आनन्दसिंह ने एक छलाँग मारी और काले पत्थर पर पैर रक्खे बिना ही कूदकर गोलाकार के ऊपर चले गये। गोलाम्बर ज्यों-का-त्यों अपने ठिकाने जमा रहा और आनन्दसिंह पुतली के हाथ से ताली तथा तलवार लेकर, जिस तरह वहाँ गये थे, उसी तरह कूदकर अपने भाई के पास चले आये और बोले–‘‘कहिए क्या मजे में ताली ले आये!’’

इन्द्रजीत : बेशक! (ताली हाथ में लेकर) यह अजब ढंग की बनी हुई है। (गौर से देखकर) इस पर कुछ अक्षर भी खुदे मालूम पड़ते हैं। मगर बिना तेज रोशनी के इनका पढ़ा जाना मुश्किल है!

आनन्द: तिलिस्मी खंजर की रोशनी करता हूँ, आप पढ़िए।

इन्द्रजीतसिंह ने तिलिस्मी खंजर की रोशनी में उसे पढ़ा और आनन्दसिंह को समझाया, इसके बाद दोनों भाई कूदकर उस गोलाम्बर पर चले गये, जिस पर हाथ में ताली लिये हुए, वह पुतली खड़ी थी। ढूँढ़ने और गौर से देखने पर दोनों भाइयों को मालूम हुआ कि उसी पुतली के दाहिने पैर में एक छेद ऐसा है, जिसमें वह तलवार जो पुतली के हाथ से ली गयी थी, बखूबी घुस जाय। भाई की आज्ञानुसार आनन्दसिंह ने वही पुतलीवाली तलवार उस छेद में डाल दी, यहाँ तक कि पूरी तलवार छेद के अन्दर चली गयी और केवल उसका कब्जा बाहर रह गया। उस समय दोनों भाइयों ने मजबूती के साथ उस पुतली को पकड़ लिया। थोड़ी देर बाद गोलाम्बर के नीचे से आवाज आयी और पहिले की तरह पुनः वह गोलाम्बर पुतली सहित घूमने लगा। पहिले धीरे-धीरे मगर फिर क्रमशः तेजी के साथ वह गोलाम्बर घूमने लगा। उस समय दोनों भाइयों के हाथ उस पुतली के साथ ऐसे चिपक गये कि मालूम होता था छुड़ाने से भी नहीं छूटें। वह गोलाम्बर घूमता हुआ जमीन के अन्दर धँसने लगा और सर में चक्कर आने के कारण दोनों भाई बेहोश हो गये।

जब वे होश में आये तो आँखें खोलकर चारों तरफ देखने लगे, मगर अन्धकार के सिवाय और कुछ भी दिखायी न दिया, इस समय इन्द्रजीतसिंह ने अपने तिलिस्मी खंजर के जरिये से रोशनी की और इधर-उधर देखने लगे। अपने छोटे भाई को पास में बैठे पाया, और उस पुतली को भी टुकड़े-टुकड़े भई उसी जगह देखा, जिसके टुकड़े कुछ गोलाम्बर के ऊपर और कुछ जमीन पर छितराये हुए थे।

इस समय भी दोनों भाइयों ने अपने को उसी गोलाम्बर पर पाया, और इससे समझे की यह गोलाम्बर ही धँसता हुआ इस नीचेवाली जमीन, के साथ आ लगा है, मगर जब छत की तरफ निगाह की तो किसी तरह का निशान या छेद न देखकर छत को बराबर और बिल्कुल साफ पाया। अब जहाँ पर दोनों भाई थे, वह कोठरी बनिस्बत ऊपरवाले (या पहिले) कमरे के बहुत छोटी थी। चारों तरफ तरह-तरह के कल पुर्जें दिखायी दे रहे थे, जिनमें से निकलकर फैले हुए लोहे के तार और लोहे की जंजीरे जाल की तरह बिल्कुल कोठरी को घेरे हुए थीं। बहुत-सी जंजीरें ऐसी थीं, जो छत में, बहुत-सी दीवार में, और बहुत-सी जमीन के अन्दर घुसी हुई थीं। इन्द्रजीतसिंह के सामने की तरफ एक छोटा-सा छोटा सा दरवाजा था, जिसके अन्दर दोनों कुमारों को जाना पड़ता। अस्तु, दोनों कुमार गोलाम्बर के नीचे उतरे और तारों तथा जंजीरों से बचते हुए उस दरवाजे के अन्दर गये। यह रास्ता एक सुरंग की तरह था, जिसकी छत जमीन और दोनों तरफ की दीवारें मजबूत पत्थर की बनी हुई थीं, दोनों कुमार थोड़ी दूर तक उसमें बराबर चलते गये, और इसके बाद एक ऐसी जगह पहुँचे, जहाँ ऊपर की तरफ निगाह करने से आसमान दिखायी देता था। गौर करने से दोनों कुमारों को मालूम हुआ कि यह स्थान वास्तव में कूएँ की तरह है। इसकी जमीन (किसी कारण से) बहुत ही नरम और गुदगुदी थी। बीच में एक पतला लोहे का खम्भा था और खम्भे के नीचे जंजीर के सहारे एक खटोली बँधी हुई थी, जिस पर दो-तीन आदमी बैठे सकते थे। खटोली से अढ़ाई तीन हाथ ऊँचे (खम्भे में) एक चर्खी लगी हुई थी और चर्खी के साथ एक ताम्रपत्र बँधा हुआ था। इन्द्रजीतसिंह ने ताम्रपत्र को पढ़ा, बारीक-बारीक हरफों में यह लिखा था–

‘‘यहाँ से बाहर निकल जानेवाले को खटोली के ऊपर बैठकर यह चर्खी सीधी छुमानी चाहिए। चर्खी सीधी तरफ घुमाने से यह खम्भा खटोली को लिये हुए ऊपर जायगा और उल्टी तरफ घुमाने से यह नीचे उतरेगा। पीछे हटनेवाले को, अब वह रास्ता खुला नहीं मिलेगा, जिधर से वह आया होगा।’’

पत्र पढ़कर इन्द्रजीतसिंह ने आनन्दसिंह से कहा, ‘‘यहाँ से बाहर निकल चलने के लिए यह बहुत अच्छी तरकीब है, अब हम दोनों को भी इसी तरह बाहर हो जाना चाहिए। लो तुम इसे पढ़ लो।’’

आनन्द : (पत्र पढ़कर) आइए इस खटोली में बैठ जाइए!

दोनों कुमार उस खटोली में बैठ गये और इन्द्रजीतसिंह चर्खी घुमाने लगे जैसे-जैसे चर्खी घुमाते थे, वैसे-वैसे वह खम्भा खटोली को लिये हुए ऊपर की तरफ उठता जाता था। जब खम्भा कुएँ के बाहर निकल आया, तब अपने चारों तरफ की जमीन और इमारतों को देखकर दोनों कुमार चौकें और इन्द्रजीतसिंह की तरफ देखकर आनन्दसिंह ने कहा–

आनन्द : यह तो तिलिस्मी बाग का वही चौथा दर्जा है, जिसमें हम लोग कई दिन तक रह चुके हैं!

इन्द्रजीत : बेशक, वही है, मगर यह खम्भा हम लोगों को (हाथ का इशारा करके) उस तिलिस्मी इमारत तक पहुँचावेगा।

पाठक, हम सन्तति के नौवें भाग के पहिले बयान में इस बाग के चौथे भाग का हाल जो कुछ लिख चुके हैं, शायद आपको याद होगा, यदि भूल गये हों तो उसे पुनः पढ़ जाइए। उस बयान में यह भी लिख चुका है कि इस बाग के पूरब तरफवाले मकान के चारों तरफ पीतल की दीवार थी, इसलिए उस मकान का केवल ऊपरवाला हिस्सा दिखायी देता था, और कुछ मालूम नहीं होता था कि उसके अन्दर क्या है, हाँ छत के ऊपर लोहे का एक पतला महराबदार खम्भा था, जिसका दूसरा सिरा उसके पासवाले कूएँ के अन्दर गया था। उस मकान के चारों तरफ पीतल की जो दीवार थी, उसमें एक बन्द दरवाजा भी दिखायी देता था, और उसके दोनों तरफ पीतल के दो आदमी हाथ मे नंगी तलवार लिये खड़े थे, इत्यादि।

यह उसी मकान के साथवाला कूआँ था, जिसमें से इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह निकले थे। धीरे-धीरे ऊँचे होकर दोनों भाई उस मकान की छत पर जा पहुँचे, जिसके चारों तरफ पीतल की दीवार थी। खटोली को मकान की छत पर पहुँचाकर वह खम्भा अड़ गया, और दोनों कुमारों को उस पर से उतर जाना पड़ा। पहले जब दोनों कुमार इस बाग के (चौथे दरजे के) अन्दर आये थे, तब इस मकान के अन्दर का हाल कुछ जान नहीं सके थे, मगर अब तो इत्तिफाक ने खुद ही इन दोनों को उस मकान में पहुँचा दिया, इसलिए बड़े उत्साह से दोनों भाई इस जगह का तमाशा देखने के लिए तैयार हो गये।

इस मकान की छत पर एक रास्ता नीचे उतर जाने के लिए था, उसी राह से दोनों भाई नीचेवाली मंजिल में उतरकर एक छोटे से कमरे में पहुँचे, जहाँ की छत जमीन और चारों तरफ की दीवारों में कलई किये हुए दलदार शीशे बड़ी कारीगरी से जुड़े हुए थे। अगर एक आदमी भी उस कमरे में जाकर खड़ा हो तो अपनी हजारों सूरतें* देखकर घबड़ा जाय। सिवाय इस बात के उस कमरे में और कुछ भी न था, और न यही मालूम होता था कि यहाँ से किसी और जगह जाने के लिए रास्ता है। (* यदि दो बड़े शीशे आमने-सामने रखकर देखिए तो शीशों में दो चार ही नहीं बल्कि हजारों शीशे एक-दूसरे के अन्दर दिखायी देंगे।)

उस कमरे की अवस्था देखकर इन्द्रजीतसिंह हँसे, और आनन्दसिंह की तरफ देखकर बोले–

इन्द्रजीत : इसमे कोई सन्देह नहीं कि इस कमरे में इन शीशों की बदौलत एक प्रकार की दिल्लगी है, मगर आश्चर्य इस बात का होता है कि तिलिस्म बनानेवालों ने यह फजूल कार्रवाई क्यों की है! इन शीशों के लगाने से कोई फायदा या नतीजा तो मालूम नहीं होता!

आनन्द : मैं भी यही सोच रहा हूँ, मगर विश्वास नहीं होता कि तिलिस्मी बनानेवालों ने इसे व्यर्थ ही बनाया होगा, कोई-न-कोई बात इसमें जरूर होगी। इस मकान में इसके सिवाय अभी तक कोई दूसरी अनूठी बात दिखायी नहीं दी, अगर यहाँ कुछ है तो केवल यही एक कमरा है, अस्तु, इस कमरे को फजूल समझना इस इमारत-भर को फजूल समझना होगा, मगर ऐसा हो नहीं सकता। देखिए इसी मकान से उस लोहे वाले खम्भे का सम्बन्ध है, जिसकी बदौलत हम...(रुककर) सुनिए-सुनिए, यह आवाज कैसी और कहाँ से आ रही है?

बात करते-करते आनन्दसिंह रुक गये और ताज्जुब-भरी निगाहों से अपने भाई की तरफ देखने लगे, क्योंकि उन्हें दो आदमियों के जोर-जोर से बातचीत करने की आवाज सुनायी देने लगी। वह आवाज यह थी:–

एक : तो क्या दोनों कुमार उस कूएँ से निकलकर यहाँ आ जाँयगे।

दूसरा : हाँ, जरूर आ जायँगे। उस कूएँ में जो लोहे का खम्भा गया हुआ है, उसमें एक खटोली बँधी हुई है, उस खटोली पर बैठकर एक कल घुमाते हुए दोनों आदमी यहाँ आ जायँगे।

पहिला : तब तो बड़ी मुश्किल होगी, हम लोगों को यह जगह छोड़ देनी पड़ेगी।

दूसरा : हम लोग इस जगह को क्यों छोड़ने लगे? जिसके भरोसे पर हम लोग यहाँ बैठे हैं, क्या वह दोनों राजकुमारों से कमजोर है? खैर उसे जाने दो पहिले तो हमी लोग उन्हें तंग करने के लिए बहुत हैं।

पहिला : इसमें तो कोई शक नहीं है कि हम लोग उनकी ताकत और जवाँमर्दी को हवा खिला सकते हैं, मगर एक काम जरूर करना चाहिए।

दूसरा : वह क्या?

पहिला : इस कमरे का वह दरवाजा खोल देना चाहिए जिसमें भयानक अजगर रहता है, जब दोनों उसे खुला देख उसके अन्दर जाँयेंगे तो निःसन्देह वह अजगर उन दोनों को निगल जायगा।

दूसरा: और बाकी के दरवाजे मजबूती के साथ बन्द कर देने चाहिए, जिसमें वे और किसी तरफ जा न सकें।

पहिला : बेशक, इसके अतिरिक्त एक काम और भी करना चाहिए, जिसमें वे दोनों उस दरवाजे के अन्दर जरूर जाँय अर्थात् उन दोनों लड़कियों को भी उस अजगरवाली कोठरी में हाथ-पैर बाँधकर पहुँचा देना चाहिए, जिन पर दोनों कुमार आशिक हैं।

दूसरा : यह तुमने बहुत अच्छी बात कही। जब वह अजगर उन लड़कियों को निगलना चाहेगा तो वे जरूर चिल्लायेंगी, उस समय आवाज पहिचाने पर वे दोनों अपने को किसी तरह रोक न सकेंगे और उस दरवाजे के अन्दर जाकर अजगर की खूराक बनेंगे।

पहिला : यह भी अच्छी बात कही। अच्छा उन दोनों को पकड़ लाओ और हाथ-पैर बाँधकर उस कोठरी में डाल दो, अगर इस कार्रवाई से काम न चलेगा तो दूसरी कार्रवाई की जायगी, मगर उन्हें इस मकान के बाहर न जाने देंगे।

इसके बाद वह बातचीत की आवज बन्द हो गयी और यकायक सामने वाले आइने में कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह ने अपने प्यारे ऐयार भैरोसिंह और तारासिंह की सूरत देखी, सो भी  इस ढंग से कि दोनों ऐयार अकड़ते हुए एक तरफ से आये और दूसरी तरफ को चले गये। इसके बाद दो औरतों की सूरत नजर आयी। पहिले तो पहिचानने में कुछ शक हुआ, मगर तुरन्त ही मालूम हो गया कि वे दोनों कमिलिनी और लाडिली हैं। उन दोनों की कमर में लोहे की जंजीरें बँधी हुई थीं और एक मजबूत आदमी उन्हें अपने हाथ में लिये हुए उन दोनों के पीछे-पीछे जा रहा था। यह भी देखा कि कमिलनी और लाडिली चलते-चलते रुकी और उसी समय पिछले आदमी ने उन दोनों को धक्का दिया जिससे वे झुक गयीं और सर हिला कर आगे बढ़ती हुई नजरों से ओट हो गयीं।

भैरोसिंह और तारासिंह यहाँ कैसे आ पहुँचे? और कमलिनी तथा लाडिली को कैदियों की तरह ले जानेवाला वह कौन था? इस शीशें के अन्दर उन सभों की सूरत कैसे दिखायी पड़ी? चारों तरफ से बन्द रहने पर भी यहाँ आवाज कैसे आयी, इन बातों को सोचते हुए दोनों कुमार बहुत ही दुःखी हुए।

आनन्द : भैया, यह तो बड़े आश्चर्य की बात मालूम पड़ती है। यह लोग (अगर वास्तव में कोई हों तो) कहते हैं कि अजगर कुमारों को निगल जायगा। मगर हम लोग तो खुद ही अजगर के मुँह में जाने के लिए तैयार हैं, या वे लोग कोई धोखा देना चाहते हैं?

इन्द्रजीत : मैं भी इन्हीं बातों को सोच रहा हूँ। तिलिस्मी बाजें की आवाज को झूठा समझना तो बुद्धमानी की बात न होगी, क्योंकि भरोसे पर हम लोग तिलिस्म तोड़ने के लिए तैयार हुए हैं, मगर हाँ इस बातों का पता लगाये बिना अजहदे के मुँह में जाने की इच्छा नहीं होती कि यह आवाज, आखिर थी कैसी और इस आइने में जिन लोगों की बात-चीत की आवाज सुनायी दी है, वे वास्तव में कोई हैं भी या सब बिल्कुल तिलिस्मी खेल ही है? कलई किये हुए आइने में किसी ऐसे आदमी की सूरत भला क्योंकर दिखायी दे सकती है, जो उसके सामने न हो।

आनन्द : बेशक यह एक नयी बात है। अगर किसी के सामने हम यह किस्सा बयान करें तो वह यही कहेगा कि तुमको धोखा हुआ। जिन लोगों को तुमने आइने में देखा था, वे तुम्हारे पीछे की तरफ से निकल गये होंगे और तुमने उस बात का खयाल न किया होगा। मगर नहीं अगर वास्तव में ऐसा होता तो आईने में भी उन्हें अपने पीछे की तरफ से जाते हुए देखते। जरूर इसका सबब कोई दूसरा ही है, जो हम लोगों को समझ में नहीं आ रहा है।

इन्द्रजीत : खैर, फिर अब किया क्या जाय? इस मंजिल से नीचे उतर जाने या किसी और तरफ जाने के लिए रास्ता भी तो दिखायी नहीं देता। (उँगली का इशारा करके) सिर्फ वह एक निशान है, जहाँ, से अपने आप एक दरवाजा पैदा होगा या हम लोग दरवाजा पैदा कर सकते हैं, मगर वह दरवाजा उसी अजदवेवाली कोठरी का है, जिसमें जाने के लिए हम लोग यहाँ आये हैं।

आनन्द : ठीक है, मगर क्या हम लोग तिलिस्मी खंजर से इस शीशे को तोड़ या काट नहीं सकते?

इन्द्रजीत : जरूर काट सकते हैं मगर यह कार्रवाई अपने मन की होगी।

आनन्द : तो क्या हर्ज है, आज्ञा दीजिए तो मैं एक हाथ शीशे पर लगाऊँ!

इन्द्रजीत : सो ही कर देखो, मगर कहीं कोई बखेड़ा न पैदा हो?

‘‘अब जो होना हो सो हो!’’ इतना कहकर आनन्दसिंह तिलिस्मी खंजर लिये हुए आइने की तरफ बढ़े। उसी वक्त एक आवाज हुई और बायें तरफ की शीशेवाली दीवार में ठीक उसी जगह एक छोटा-सा दरवाजा निकल आया, जहाँ कुमार ने हाथ का इशारा करके आनन्दसिंह को बताया था, मगर दोनों कुमारों ने उसके अन्दर जाने का खयाल भी न किया और आनन्दसिंह ने तिलिस्मी खंजर का एक भरपूर हाथ अपने सामाने वाले शीशे पर लगाया, जिसका नतीजा यह हुआ कि शीशे का एक बहुत बड़ा टुकड़ा भारी आवाज देकर पीछे की तरफ हट गया और आनन्दसिंह इस तरह उसके अन्दर घुसे गये, जैसे हवा के किसी खिंचाव या बवन्डर ने उन्हें अपनी तरफ खींच लिया हो, इसके बाद वह शीशे का टुकड़ा फिर ज्यों-का-त्यों बराबर मालूम होने लगा।

हवा के खिंचाव का असर कुछ-कुछ इन्द्रजीतसिंह पर भी पड़ा, मगर वे दूर खड़े थे, इसलिए खिंचकर वहाँ तक न जा सके, पर आनन्दसिंह उसके पास होने के कारण खिंचकर अन्दर चले गये।

आनन्दसिंह का यकायक इस तरह आफत में फँस जाना बहुत ही बुरा हुआ, इस बात का जितना रंज इन्द्रजीतसिंह को हुआ सो वे ही जान सकते हैं। उनकी आँखों भर आया और वे बेचैन होकर धीरे से बोले-‘‘उनकी आखों में आँसू भर आये और वे बेचैन होकर धीरे से बोले–‘‘अब जब तक कि मैं इस शीशे के अन्दर न चला जाऊँगा, अपने भाई को छुड़ा न सकूँगा, और न इस बात का ही पता लगा सकूँगा कि उस पर क्या मुसीबत आयी।’’ इतना कह वे तिलिस्मी खंजर लिए हुए शीशे की तरफ बड़े, मगर दो ही कदम जाकर रुक गये और फिर सोचने लगे ‘‘कहीं ऐसा न हो कि जिस मुसीबत में आनन्द पड़ गया है, उसी मुसीबत में मैं भी फँस जाऊँ! यदि ऐसा हुआ तो हम दोनों इसी तिलिस्म में मरकर रह जायँगे। यहाँ कोई ऐसा भी नहीं जो हम लोगों की सहायता करेगा, लेकिन अगर ईश्वर की कृपा से तिलिस्म के इस दर्जे को मैं अकेला तोड़ सकूँ तो निःसन्देह आनन्द को छुड़ा लूँगा। मगर कहीं ऐसा न हो कि जब तक हम तिलिस्म तोड़ें, तब तक आनन्द की जान पर आ बने? बेशक इस आवाज ने हम लोगों को धोखे में डाल दिया, हमें तिलिस्मी बाजे पर भरोसा करके बेखौफ अजदहे के मुँह में चले जाना चाहिए था।’’ इत्यादि तरह-तरह की बातें सोचकर इन्द्रजीतसिंह रुक गये और आनन्दसिंह की जुदाई में आँसू गिराते हुए उसी अजहदेवाली कोठरी में चले गये, जिसका दरवाजा पहिले ही खुल चुका था।

उस कोठरी में सिवाय एक अजहदे के और कुछ भी न था। इस अजहदे की मोटाई दो गज घेरे से कम न होगी। उसका खुला मुँह इस योग्य था कि उद्योग करने से आदमी उसके पेट में बखूबी घुस जायँ। वह एक सोने के चबूतरे के ऊपर कुण्डली मारे बैठा था और अपने डील-डौल और खुले हुए भयानक मुँह के कारण बहुत ही डरवाना मालूम पड़ता था। झूठा और बनावटी मालूम हो जाने पर भी उसके पास जाना या खड़ा होना, बड़े जीवट का काम था।

इन्द्रजीतसिंह बेखौफ उस अजहदे के मुँह में घुस गये और कोशिश करके आठ या नौ हाथ के लगभग नीचे उतर गये। इस बीच में उन्हें गर्मी तथा साँस लेने की तंगी से बहुत तकलीफ हुई और उसके बाद, उन्हें नीचे उतर जाने के लिए दस-बारह सीढ़ियाँ मिलीं। नीचे उतरने पर कई कदम एक सुरंग में चलना पड़ा और इसके बाद वे उजाले में पहुँचे।

अब जिस जगह इन्द्रजीतसिंह पहुँचे वह एक छोटा-सा तिमंजिला मकान संगमरमर के पत्थरों से बना हुआ था, जिसका ऊपरी हिस्सा बिल्कुल खुला हुआ था, अर्थात् चौंक में खड़े होने से आसमान दिखायी देता था। नीचेवाले खण्ड में जहाँ इन्द्रजीतसिंह खड़े थे, चारों तरफ चार दालान थे, और चारों दालान अच्छे बेशकीमत सोने के जड़ाऊ नुमाइशी बरतनों तथा हर्बों से भरे हुए थे। कुमार उस बेहिसाब दौलत तथा अनमोल चीजों को देखते हुए, जब बायीं तरफवाले दालान में पहुँचे तो यहाँ की दीवार में भी उन्होंने एक छोटा-सा दरवाजा देखा। झाँकने से मालूम हुआ कि ऊपर के खण्ड में जाने के लिए सीढ़ियाँ हैं। कुँअर इन्द्रजीतसिंह सीढ़ियों की राह ऊपर चढ़ गये। उस खण्ड में भी चारों तरफ दालान थे। पूरब तरफवाले दालान में कल-पुरजे लगे हुए थे, उत्तर तरफवाले दालान में एक चबूतरे के ऊपर लोहे का एक सन्दूख उसी ढंग का था, जैसाकि तिलिस्मी बाजा कुमार देख चुके थे। दक्खिन तरफवाले दालान में कई पुतलियाँ खड़ी थीं, जिनके पैरों में गड़ारीदार पहिए की तरह कुछ बना हुआ था, जमीन में लोहें की नालियाँ जड़ी हुई थीं और नालियों में पहिया चढ़ा हुआ था, अर्थात् वह पुतलियाँ इस लायक थीं कि पहियों पर नलियों की बरकत से बँधे हुए (महदूद) स्थान तक चल फिर सकती थीं, और पश्चिम तरफवाले दालान में सिवाय एक शीशे की दीवार के और कुछ भी दिखायी नहीं देता था।

उन पुतलियों में कुमार ने कई अपने जान-पहिचानवाले और संगी साथियों की मूरतें भी देखीं उन्हीं में भैंरोसिंह तारासिंह कमलिनी लाडिली राजा गोपालसिंह और अपनी तथा अपने छोटे भाई की भी मूरतें देखीं, जो डील-डौल नक्शे में बहुत साफ बनी हुई थीं। कमलिनी और लाडिली की मूरतों की कमर में लोहे की जंजीर बँधी हुई थी और एक मजबूत आदमी उसे थामे हुए था। कुमार ने मूरतों को हाथ का धक्का देकर चलाना चाहा, मगर वह अपनी जगह से एक अंगुल भी न हिला। कुमार ताज्जुब से उनकी तरफ देखने लगे।

इन सब चीजों को गौर और ताज्जुब की निगाह से कुमार देख ही रहे थे कि यकायक दो आदमियों के बातचीत की आवाज उनके कान में पड़ी। वे चौंककर चारों तरफ देखने लगे, मगर किसी आदमी की सूरत न दिखायी पड़ी, थोड़ी ही देर में इतना जरूर मालूम हो गया कि उत्तर तरफवाले दालान में चबूतरों के ऊपर जो लोहेवाला सन्दूक है, उसी में से यह आवाज निकल रही है। कुमार समझ गये कि वह सन्दूक उसी तरह का कोई तिलिस्मी बाजा है, जैसाकि पहिले देख चुके हैं। अस्तु, वे तुरत उस बाजे के पास चले आये और आवाज सुनने लगे। यह बातचीत या आवाज ठीक वही थी, जो कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह शीशेवाले कमरे में सुन चुके थे, अर्थात् एक ने कहा, ‘‘तो क्या दोनों कुमार कुएँ में से निकलकर यहाँ आ जायेंगे!’’ उसी के बाद दूसरे आदमी के बोलने की आवाज आयी मानों दूसरे न जवाब दिया, ‘‘हाँ जरूर आ जायँगे, उस कुएँ में लोहे का खम्भा गया हुआ है, उसमें एक खटोली बँधी हुई है, उस खटोली पर बैठकर एक कल घुमाते हुए दोनों आदमी यहाँ आ जायँगे–’’ इत्यादि जो-जो बातें दोनों कुमारों ने उस शीशेवाले कमरे में सुनी थीं, ठीक वे ही बातें उसी ढंग की आवाज में कुमार ने इस बाजे में भी सुनीं। उन्हें बड़ा ताज्जुब हुआ और उन्होंने इस बात का निश्चय कर लिया कि अगर वह शीशेवाला कमरा इस दीवार के बगल में है तो निःसन्देह यही आवाज हम दोनों भाइयों ने सुनी थी। इसके साथ ही कुमार की निगाह पश्चिम तरफवाले दालान में शीशे की दीवार के ऊपर पड़ी और वे धीरे से बोल उठे, ‘‘बेशक इसी दीवार के उस तरफ वह कमरा है और ताज्जुब नहीं कि उस कमरे में इस तरफ यही शीशे की दीवार हम लोगों ने देखी भी हो।’’

इतने ही में दक्खिन तरफवाले दालान में से धीरे-धीरे कुछ कल-पुर्जों के घूमने की आवाज आने लगी कुमार ने उस तरफ देखा तो भैरोसिंह और तारासिंह की मूरत को अपने ठिकाने से चलते हुए पाया। उन दोनों मूरतों की अकड़ कर चलने वाली चाल भी ठीक वैसी ही थी, जैसी कुमार उस शीशे के अन्दर देख चुके थे। जिस समय वे दोनों मूरतों चलती हुईं उस शीशेवाली दीवार के पास पहुँची, उस समय दीवार में एक दरवाजा निकल आया और दोनों मूरतें अन्दर घुस गयीं। इसके बाद कमलिनी और लाडिली की मूरतें चलीं, और उनके पीछे वाला आदमी जो जंजीर थामे हुए था, पीछे-पीछे चला, ये सब उसी तरह शीशेवाली दीवार के अन्दर जाकर थोड़ी देर के बाद, फिर अपने ठिकाने लौट आये और वह दरवाजा ज्यों-का-त्यों बन्द हो गया। अब कुँअर इन्द्रजीतसिंह के दिल में किसी तरह का शक नहीं रहा, उन्हें निश्चय हो गया कि उस शीशेवाले कमरे में जोकुछ हम दोनों ने सुना और देखा, वह वास्तव में कुछ भी न था, या अगर कुछ था, तो वही जो कि यहाँ आने से मालूम हुआ है, साथ ही इसके कुमार यह भी सोचने लगे कि ये हमारे संगी-साथियों और मुलाकातियों की मूरतें पुरानी बनी हुई हैं, या उन तस्वीरों की तरह इन्हें भी राजा गोपालसिंह ने स्थापित किया है, और इन मूरतों का चलना-फिरना तथा इस बाजे का बोलना किसी खास वक्त पर मुकर्रर है, या घण्टे-घण्टे दो-दो घण्टे पर ऐसा ही हुआ करता है? मगर नहीं घड़ी-घड़ी व्यर्थ ऐसा होना अनुचित है। तो क्या जब शीशेवाले कमरे में कोई जाता है, तभी ऐसी बातें होती हैं! क्योंकि हम लोगों के भी वहाँ पहुँचने पर यही दृश्य देखने में आया था। अगर मेरा यह खयाल ठीक है तो अब भी उस शीशेवाले कमरे में कोई पहुँचा होगा। गैर आदमी का वहाँ पहुँचना तो असम्भव है–अगर कोई वहाँ पहुँचता है, तो चाहे वह आनन्दसिंह हो या राजा गोपालसिंह हो। कौन ठिकाना फिर किसी कारण से आनन्दसिंह वहाँ जा हो। अगर ऐसा हो तो जिस तरह इस बाजे की आवाज उस कमरे में पहुँचती है, उसी तरह मेरी आवाज भी वहाँवाला सुन सकता है। इत्यादि बातें कुमार ने जल्दी-जल्दी सोचीं और इसके बाद ऊँचे स्वर में बोले, ‘शीशेवाले कमरे में कौन है?’’

जवाब : मैं हूँ आनन्दसिंह, क्या मैं भाई साहब की आवाज सुन रहा हूँ?

इन्द्रजीत : हाँ, मैं यहाँ आ पहुँचा हूँ, तुम भी जहाँ तक जल्दी हो सके, उस अजदहे के मुँह में चले जाओ हमारे पास पहुँचो।

जवाब : बहुत अच्छा!

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