Chandrakanta Santati - 6 - Hindi book by - Devkinandan Khatri - चन्द्रकान्ता सन्तति - 6 - देवकीनन्दन खत्री
लोगों की राय

मूल्य रहित पुस्तकें >> चन्द्रकान्ता सन्तति - 6

चन्द्रकान्ता सन्तति - 6

देवकीनन्दन खत्री

Download Book
प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :237
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8404
आईएसबीएन :978-1-61301-031-0

Like this Hindi book 10 पाठकों को प्रिय

192 पाठक हैं

चन्द्रकान्ता सन्तति 6 पुस्तक का ईपुस्तक संस्करण...

दसवाँ बयान


यह दालान, जिसमें इस समय महाराज सुरेन्द्रसिंह वगैरह आराम कर रहे हैं, बनिस्बत उस दालान के जिसमें ये लोग पहिलेपहल पहुँचे थे, बड़ा और खूबसूरत बना हुआ था। तीन तरफ दीवार थी और बाग की तरफ तेरह खम्भे और महराब लगे हुए थे, जिससे इसे बारहदरी भी कह सकते हैं। इसकी कुर्सी लगभग ढाई हाथ के ऊँची थी और इसके ऊपर चढ़ने के लिए पाँच सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। बारहदरी के आगे की तरफ कुछ सहन छूटा हुआ था, जिसकी जमीन (फर्श) संगमरमर और संगमूसा के चौखूटे पत्थरों से बनी हुई थी। बारहदरी की छत में मीनाकारी का काम बना हुआ था और तीनों तरफ की दीवारों में कई आलमारियाँ भी थीं।

रात पहर-भर से कुछ ज्यादे जा चुकी थी। इस बारहदरी में जिसमें सब कोई आराम कर रहे थे, एक आलमारी की कार्निस के ऊपर मोमबत्ती जल रही थी, जो देवीसिंह ने अपने ऐयारी के बटुए में से निकालकर जलायी थी। किसी को नींद नहीं आयी थी, बल्कि सबकोई बैठे हुए आपस में बातें कर रहे थे। महाराज सुरेन्द्रसिंह बाग की तरफ मुँह किये बैठे थे और उन्हें सामने की पहाड़ी का आधा हिस्सा भी, जिस पर इस समय अन्धकार की बारीक चादर पड़ी हुई थी, दिखायी दे रहा था। उस पहाड़ी पर यकायक मशाल की रोशनी देखकर महाराज चौंके और सभों को उस तरफ देखने का इशारा किया।

सभों ने उस रोशनी की तरफ ध्यान दिया और दोनों कुमार ताज्जुब के साथ सोचने लगे कि यह क्या मामला है? इस समय तिलिस्म में हमारे सिवाय किसी गैर आदमी का आना कठिन ही नहीं, बल्कि असम्भव है, तब फिर यह मशाल की रोशनी कैसी! खाली रोशनी ही नहीं, बल्कि उसके पास चार-पाँच आदमी भी दिखाई देते हैं, हाँ, यह नहीं जान पड़ता कि वे सब औरत हैं या मर्द?

और लोगों के विचार भी दोनों कुमारों ही की तरह के थे और मशाल के साथ कई आदमियों को देखकर सभी ताज्जुब कर रहे थे। यकायक वह रोशनी गायब हो गयी और आदमी दिखायी देने से रह गये, मगर थोड़ी ही देर बाद वह रोशनी फिर दिखायी दी। अबकी दफे रोशनी और भी नीचे की तरफ थी और उसके साथ के आदमी साफ-साफ दिखायी देते थे।

गोपाल : (इन्द्रजीतसिंह से) मैं समझता था कि आप दोनों भाइयों के सिवाय कोई गैर आदमी इस तिलिस्म में नहीं आ सकता।

इन्द्रजीत : मेरा भी यही खयाल था, मगर क्या आप भी यहाँ तक नहीं आ सकते? आप तो तिलिस्म के राजा हैं।

गोपाल : हाँ, मैं आ तो सकता हूँ मगर सीधी राह से और अपने को बचाते हुए, वे काम मैं नहीं कर सकता, जो आप कर सकते हैं, परन्तु आश्चर्य तो यह है कि वे लोग पहाड़ पर से आते हुए दिखायी दे रहे हैं, जहाँ से आने का रास्ता ही नहीं है। तिलिस्म बनानेवालों ने इस बात को जरूर अच्छी तरह विचार लिया होगा।

इन्द्रजीत : बेशक, ऐसा ही है, मगर यहाँ पर क्या समझा जाय? मेरा खयाल है कि थोड़ी ही देर में वे लोग इस बाग में आ पहुँचेंगे।

गोपाल : बेशक ऐसा ही होगा, (रुककर) देखिए रोशनी फिर गायब हो गयी, शायद वे लोग किसी गुफा में घुस गये। कुछ देर तक सन्नाटा रहा और सबकोई बड़े गौर से उस तरफ देखते रहे, इसके बाद यकायक बाग के पश्चिम तरफवाले दालान में रोशनी मालूम होने लगी, जो उस दालान के ठीक सामने था, जिसमें हमारे महाराज तथा ऐयार लोग टिके हुए थे, मगर पेड़ों के सबब से साफ नहीं दिखायी देता था कि दालान में कितने आदमी आये हैं और क्या कर रहे हैं।

जब सभों को निश्चय हो गया कि वे लोग धीरे-धीरे पहाड़ों के नीचे उतरकर बाग के दालान या बारहदरी में आ गये हैं, तब महाराज सुरेन्द्रसिंह ने तेजसिंह को हुक्म दिया कि जा कर देखो और पता लगाओ कि वे लोग कौन हैं और क्या कर रहे हैं।

गोपाल : (महाराज) तेजसिंह का जाना वहाँ उचित न होगा, क्योंकि यह तिलिस्म का मामला है और यहाँ की बातों से ये बिल्कुल बेखबर हैं, यदि आज्ञा हो तो कुँअर इन्द्रजीतसिंह को साथ लेकर मैं जाऊँ।

महाराज : ठीक है, अच्छा तुम्हीं दोनों आदमी जाकर देखो क्या मामला है।

कुँअर इन्द्रजीतसिंह और राजा गोपालसिंह वहाँ से उठे और धीरे-धीरे तथा पेड़ों की आड़ में अपने को छिपाते हुए उस दालान अथवा बारहदरी के बहुत पास पहुँच गये और एक पेड़ की आड़ में खड़े होकर गौर से देखने लगे।

इस दालान में उन्हें पन्द्रह आदमी दिखायी दिये, जिनके विषय में यह जानना कठिन था कि वे मर्द हैं या औरत, क्योंकि सभों की पोशाक एक ही रंग-ढंग की तथा सभों के चेहरे पर नकाब पड़ी हुई थी। इन्हीं पन्द्रह आदमियों में से दो आदमी मशालची का काम दे रहे थे। जिस तरह उनकी पोशाक खूबसूरत और बेशकीमती थी, उसी तरह मशाल भी सुनहरी तथा जड़ाऊ काम की दिखायी दे रही थी और उसके सिरे की तरफ बिजली की तरह रोशनी हो रही थी, इसके अतिरिक्त उनके हाथ में तेल की कुप्पी न थी और इस बात का कुछ पता नहीं लगता था कि इस मशाल की रोशनी का सबब क्या है।

राजा गोपालसिंह और इन्द्रजीतसिंह ने देखा कि वे लोग शीघ्रता के साथ उस दालान के सजाने और फर्श वगैरह के ठीक करने का इन्तजाम कर रहे हैं। बारहदरी के दाहिने तरफ एक खुला हुआ दरवाजा है, जिसके अन्दर वे लोग बार-बार जाते हैं और जिस चीज की जरूरत समझते हैं, ले आते हैं। यद्यपि उन सभों की पोशाक एक ही रंग-ढंग की है और इसलिए बड़ाई-छुटाई का पता लगाना कठिन है, तथापि उन सभों में से एक आदमी ऐसा है, जो स्वयं कोई काम नहीं करता और एक किनारे कुर्सी पर बैठा हुआ अपने साथियों से काम ले रहा है। उसके हाथ में एक विचित्र ढंग की छड़ी दिखायी दे रही है, जिसके मुट्ठे पर नेहायत खूबसूरत और कुछ बड़ा हिरन बना हुआ है। देखते-ही-देखते थोड़ी देर में बारहदरी सज के तैयार हो गयी और कन्दीलों की रोशनी से जगमगाने लगी। उस समय वह नकाबपोश, जो कुर्सी पर बैठा हुआ था और जिसे हम उस मण्डली का सरदार भी कह सकते हैं, अपने साथियों से कुछ कह-सुनकर बारहदरी के नीचे उतर आया और धीरे-धीरे उस तरफ रवाना हुआ, जिधर महाराजा सुरेन्द्रसिंह वगैरह टिके हुए थे।

यह कैफियत देखकर राजा गोपालसिंह और इन्द्रजीतसिंह जो छिपे-छिपे तमाशा देख रहे थे, वहाँ से लौटे और शीघ्र ही महाराज के पास पहुँचकर जो कुछ देखा था, संक्षेप में बयान किया। उसी समय एक आदमी आता हुआ दिखायी दिया। सभों का ध्यान उसी तरफ चला गया और इन्द्रजीतसिंह तथा राजा गोपालसिंह ने समझा कि यह वही नकाबपोशों का सरदार होगा, जिसे हम उसी बारहदरी में देख आये हैं और जो हमारे देखते-देखते वहाँ से रवाना हो गया था, मगर जब पास आया तो सभों का भ्रम जाता रहा और एकाएक इन्द्रदेव पर निगाह पड़ते ही सब कोई चौंक पड़े। राजा गोपालसिंह और इन्द्रजीतसिंह को इस बात का भी शक हुआ कि वह नकाबपोशों का सरदार शायद इन्द्रदेव ही हो, मगर यह देखकर उन्हें ताज्जुब मालूम हुआ कि इन्द्रदेव उस (नकाबपोशों की-सी) पोशाक में न था, जैसा कि उस बारहदरी में देखा था, बल्कि वह अपनी मामूली दरबारी पोशाक में था।

इन्द्रदेव ने वहाँ पहुँचकर महाराज सुरेन्द्रसिंह, बीरेन्द्रसिंह, तेजसिंह, राजा गोपालसिंह तथा दोनों कुमारों को अदब के साथ झुककर सलाम किया और इसके बाद बाकी ऐयारों से भी ‘‘जै माया की’’ कहा।

सुरेन्द्र : इन्द्रदेव, जब से हमने इन्द्रजीतसिंह की जुबानी सुना है कि इस तिलिस्म के दारोगा तुम हो तब से हम बहुत ही खुश हैं, मगर ताज्जुब होता था कि तुमने इस बात की हमें कुछ भी खबर नहीं की और न हमारे साथ यहाँ आये ही। अब यकायक इस समय यहाँ पर तुम्हें देखकर हमारी खुशी और भी ज्यादे हो गयी। आओ हमारे पास बैठ जाओ और यह कहो कि हम लोगों के साथ तुम यहाँ क्यों नहीं आये?

इन्द्रदेव : (बैठकर) आशा है कि महाराज मेरा वह कसूर माफ करेंगे। मुझे कई जरूरी काम करने थे, जिनके लिए अपने ढंग पर अकेले आना पड़ा। बेशक, मैं इस तिलिस्म का दारोगा हूँ और इसलिए अपने को बड़ा ही खुदकिस्मत समझता हूँ कि ईश्वर ने इस तिलिस्म को आप ऐसे प्रतापी राजा के हाथ में सौंपा है। यद्यपि आपके फर्माबर्दार और होनहार पोतों ने इस तिलिस्म को फतह किया है और इस सबब से वे इसके मालिक हुए, तथापि इस तिलिस्म का सच्चा आनन्द और तमाशा दिखाना मेरा ही काम है, यह मेरे सिवाय किसी दूसरे के किये नहीं हो सकता।

जो काम कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह का था, उसे ये कर चुके अर्थात् तिलिस्म तोड़ चुके और जोकुछ इन्हें मालूम होना था हो चुका, परन्तु उन बातों, भेदों और स्थानों का पता इन्हें नहीं लग सकता, जो मेरे हाथ में हैं और जिसके सबब से मैं इस तिलिस्म का दारोगा कहलाता हूँ। तिलिस्म बनानेवालों ने तिलिस्म के सम्बन्ध में दो किताबें लिखी थीं, जिनमें से एक तो दारोगा के सुपुर्द कर गये और दूसरी तिलिस्म तोड़नेवाले के लिए छिपाकर रख गये जोकि अब दोनों कुमारों के हाथ लगी, या कदाचित् इनके अतिरिक्त और भी कोई किताब उन्होंने लिखी हो तो उसका हाल मैं नहीं जानता, हाँ, जो किताब दारोगा के सुपुर्द कर गये थे, वह वसीयतनामे के तौर पर पुश्तहापुश्त से हमारे कब्जे में चली आ रही है और आजकल मेरे पास मौजूद है। यह मैं जरूर कहूँगा कि तिलिस्म के बहुत से मुकाम ऐसे हैं, जहाँ दोनों कुमारों का जाना तो असम्भव ही है, परन्तु तिलिस्म टूटने के पहिले मैं भी नहीं जा सकता था। हाँ, अब मैं वहाँ बखूबी जा सकता हूँ। आज मैं इसीलिए इस तिलिस्म के अन्दर आपके पास आया हूँ कि इस तिलिस्म का पूरा-पूरा तमाशा आपको दिखाऊँ, जिसे कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह नहीं दिखा सकते। परन्तु इन कामों के पहिले मैं महाराज से एक चीज माँगता हूँ, जिसके बिना काम नहीं चल सकता।

महाराज : वह क्या?

इन्द्रदेव : जब तक इस तिलिस्म में आप लोगों के साथ हूँ, तब तक अदब लेहाज और कायदे की पाबन्दी से माफ रक्खा जाऊँ!

महाराज : इन्द्रदेव, हम तुमसे बहुत प्रसन्न हैं। जब तक तिलिस्म में हम लोगों के साथ हो, तभी तक के लिए नहीं, बल्कि हमेशा के लिए हमने इन बातों से तुम्हें छुट्टी दी, तुम विश्वास रक्खो कि हमारे बाल-बच्चे और सच्चे साथी भी हमारी इस बात का पूरा-पूरा लेहाज रक्खेंगे।

यह सुनते ही इन्द्रदेव ने उठकर महारज को सलाम किया और फिर बैठकर कहा, ‘‘अब आज्ञा हो तो खाने-पीने का सामान, जो आप लोगों के लिए लाया हूँ, हाजिर करूँ।’’

महाराज : अच्छी बात है लाओ, क्योंकि हमारे साथियों में से कई ऐसे हैं, जो भूख के मारे बेताब हो रहे होंगे।

तेज : मगर इन्द्रदेव तुमने इस बात का परिचय तो दिया ही नहीं कि तुम वास्तव में इन्द्रदेव ही हो या फिर कोई और?

इन्द्रदेव : (मुस्कुराकर) मेरे सिवाय कोई गैर यहाँ आ नहीं सकता।

तेज : तथापि-‘चिलेण्डोला’।

इन्द्रदेव : ‘चक्रधर’।

बीरेन्द्र : मैं एक बात और पूछना चाहता हूँ?

इन्द्रदेव : आज्ञा।

बीरेन्द्र : वह स्थान कैसा है, जहाँ तुम रहा करते हो और जहाँ मायारानी अपने दारोगा को लेकर तुम्हारे पास गयी थी?

इन्द्र : वह स्थान तिलिस्म से सम्बन्ध रखता है और यहाँ से थोड़ी ही दूर पर है। मैं स्वयं आप लोगों को ले चलकर वहाँ की सैर कराऊँगा। इसके अतिरिक्त अभी मुझे बहुत-सी बातें कहनी हैं। पहिले आप लोग भोजन इत्यादि से छुट्टी पा लें।

तेज : हम लोग मशाल की रोशनी में आप ही लोगों को पहाड़ से उतरते देख रहे थे?

इन्द्रदेव : जी हाँ, मैं एक निराले ही रास्ते से यहाँ आया हूँ। आप लोग बेशक ताज्जुब करते होंगे कि पहाड़ पर से कौन उतर रहा है, परन्तु मैं अकेला ही नहीं आया हूँ, बल्कि कई तमाशे भी अपने साथ लाया हूँ, मगर उनका जिक्र करने का अभी मौका नहीं है।

इतना कहकर इन्द्रदेव उठ खड़ा हुआ और देखते-देखते दूसरी तरफ चला गया, मगर अपनी इस बात से कि–‘कई तमाशे भी अपने साथ लाया हूँ’ कइयों को ताज्जुब और घबराहट में डाल गया।

...पीछे | आगे....

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book