Chandrakanta Santati - 6 - Hindi book by - Devkinandan Khatri - चन्द्रकान्ता सन्तति - 6 - देवकीनन्दन खत्री
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चन्द्रकान्ता सन्तति - 6

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :237
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8404
आईएसबीएन :978-1-61301-031-0

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चन्द्रकान्ता सन्तति 6 पुस्तक का ईपुस्तक संस्करण...

ग्यारहवाँ बयान


थोड़ी ही देर बाद इन्द्रदेव फिर वहाँ आया। अबकी दफे उसके साथ कई नकाबपोश भी थे, जो अपने हाथ में तरह-तरह की खाने-पीने की चीजें लिये हुए थे। एक के हाथ में जल था, जिससे जमीन धोयी गयी और खाने-पीने की चीजें वहाँ रखकर वे नकाबपोश लौट गये तथा पुनः कई जरूरी चीजें लेकर आ पहुँचे। इन्तजाम ठीक हो जाने पर इन्द्रदेव ने कायदे के साथ सभों को भोजन कराया और काम से छुट्टी मिलने पर बारहदरी में चलने के लिए अर्ज किया, जिसे उसने यहाँ पहुँच कर सजाया था और जिसका हाल हम ऊपर के बयान में लिख चुके हैं।

वास्तव में यह बारहदरी बड़ी खूबी के साथ सजायी गयी थी। यहाँ सभों के लिए कायदे के साथ बैठने और आराम करने का सामान मौजूद था, जिसे देखकर महाराज बहुत प्रसन्न हुए और इन्द्रदेव की तरफ देखकर बोले, ‘‘क्या यह सब सामान इसी बाग में मौजूद था?

इन्द्रदेव : जी हाँ, केवल इतना ही नहीं बल्कि इस बाग में जितनी इमारतें हैं, उन सभों को सजाने और दुरुस्त करने के लिए यहाँ काफी सामान है, इसके अतिरिक्त यहाँ से मेरा मकान बहुत नजदीक है, इसलिए जिस चीज की जरूरत हो, मैं बहुत जल्द ला सकता हूँ। (कुछ देर सोचकर और हाथ जोड़कर) मैं एक और भी जरूरी बात अर्ज किया चाहता हूँ।

महाराज : वह क्या?

इन्द्रदेव : यह तिलिस्म आप ही के बुजुर्गों की बदौलत बना है और उन्हीं की आज्ञानुसार जब से यह तिलिस्म तैयार हुआ है, तब से मेरे बुजुर्ग लोग इसके दारोगा होते आये हैं। अब मेरे जमाने में इस तिलिस्म की किस्मत ने पलटा खाया है। यद्यपि कुमार इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह ने इस तिलिस्म को तोड़ा या फतह किया है और इसमें की बेहिसाब दौलत के मालिक हुए हैं, तथापि यह तिलिस्म अभी दौलत से खाली नहीं हुआ है और न ऐसा खुल ही गया है कि ऐरे-गैरे, जिसका जी चाहे इसमें घुस आये। हाँ, यदि आज्ञा हो तो दोनों कुमारों के हाथ से मैं इसके बचे-बचाये हिस्से को भी तोड़वा सकता हूँ, क्योंकि यह काम इस तिलिस्म के दारोगा का अर्थात मेरा है, मगर मैं चाहता हूँ कि बड़े लोगों की इस कीर्ति को एकदम से मटियामेट न करके भविष्य के लिए भी कुछ छोड़ देना चाहिए। आज्ञा पाने पर मैं इस तिलिस्म की पूरी सैर कराऊँगा और तब अर्ज करूँगा कि बुजुर्गों की आज्ञानुसार इस दास ने भी जहाँ तक हो सका, इस तिलिस्म की खिदमत की, अब महाराज को अख्तियार है कि मुझसे हिसाब-किताब समझकर आइन्दे के लिए, जिसे चाहें यहाँ का दारोगा मुकर्रर करें।

महाराज : इन्द्रदेव, मैं तुमसे और तुम्हारे कामों से बहुत ही प्रसन्न हूँ, मगर मैं यह नहीं चाहता कि तुम मुझे बातों के जाल में फँसाकर बेवकूफ बनाओ और यह कहो कि ‘भविष्य के लिए किसी दूसरे को यहाँ का दारोगा मुकर्रर कर लो’। जो कुछ तुमने राय दी है, वह बहुत ठीक है, अर्थात् इस तिलिस्म के बचे-बचाये स्थानों को छोड़ देना चाहिए, जिसमें बड़े लोगों का नाम-निशान बना रहे, मगर यहाँ के दारोगा की पदवी सिवाय तुम्हारे खानदान के कोई दूसरा कब पा सकता है? बस दया करके इस ढंग की बातों को छोड़ दो और जो कुछ खुशी-खुशी कर रहे हो, करो।

इन्द्रदेव : (अदब के साथ सलाम करके) जो आज्ञा। मैं एक बात और भी निवेदन किया चाहता हूँ।

महाराज : वह क्या?

इन्द्रदेव : वह यह कि इस जगह से आप कृपा करके पहिले मेरे स्थान को जहाँ मैं रहता हूँ, पवित्र कीजिए और तब तिलिस्म की सैर करते हुए, अपने चुनारगढ़वाले तिलिस्मी मकान में पहुँचिए। इसके अतिरिक्त इस तिलिस्म के अन्दर जोकुछ कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह ने पाया है, अथवा वहाँ से जिन चीजों को निकालकर चुनारगढ़ पहुँचाने की आवश्यकता है, उनकी फिहरिस्त मुझे मिल जाय कि कौन चीज कहाँ पर है, तो उन्हें वहाँ से बाहर करके आपके पास भेजने का बन्दोबस्त करूँ। यद्यपि यह काम भैरोसिंह और तारासिंह भी कर सकते हैं, परन्तु जिस काम को मैं एक दिन में करूँगा, उसे वे चार दिन में भी पूरा न कर सकेंगे, क्योंकि मुझे यहाँ के कई रास्ते मालूम हैं, जिस चीज को जिस राह से निकाल ले जाने में सुभीता देखूँगा, निकाल ले जाऊँगा।

महाराज : ठीक है, मैं भी इस बात को पसन्द करता हूँ और यह भी चाहता हूँ कि चुनार पहुँचने के पहिले ही तुम्हारे विचित्र स्थान की सैर कर लूँ। चीजों की फिहरिस्त और उनका पता इन्द्रजीतसिंह तुमको देंगे।

इतना कहके महाराज ने इन्द्रजीतसिंह की तरफ देखा और कुमार ने उन सब चीजों का पता इन्द्रदेव को बताया, जिन्हें बाहर निकाल कर घर पहुँचाने की आवश्यकता थी और साथ-ही-साथ अपना तिलिस्मी किस्सा भी, जिसके कहने की जरूरत थी, इन्द्रदेव से बयान किया और बाद में दूसरी बातों का सिलसिला छिड़ा।

बीरेन्द्र : (इन्द्रदेव से) आपने कहा था कि ‘मैं कई तमाशे साथ लाया हूँ, तो क्या वे तमाशे ढके रह जायेंगे।

इन्द्रदेव : जी नहीं, आज्ञा हो तो अभी उन्हें पेश करूँ, परन्तु यदि आप मेरे मकान पर चलकर उन तमाशों को देखेंगे तो कुछ विशेष आनन्द मिलेगा।

महाराज : यही सही, हम लोग तो अभी तुम्हारे मकान पर चलने के लिए तैयार हैं।

इन्द्रदेव : अब रात बहुत चली गयी है, महाराज दो-चार घण्टे आराम कर लें, दिन-भर की हरारत मिट जाय, जब कुछ रात बाकी रह जायेगी, तो मैं जगा दूँगा और अपने मकान की तरफ ले चलूँगा। तब तक मैं अपने साथियों को वहाँ रवाना कर देता हूँ, जिसमें आगे चलकर सभों को होशियार कर दें और महाराज के लिए हरएक तरह का सामान दुरुस्त हो जाय।

इन्द्रदेव की बात को महाराज ने पसन्द करके, सभों को आराम करने की आज्ञा दी और इन्द्रदेव भी वहाँ से बिदा होकर, किसी दूसरी जगह चला गया।

इधर-उधर की बातचीत करते महाराज को नींद आ गयी, बीरेन्द्रसिंह दोनों कुमार और राजा गोपालसिंह भी सो गये तथा और ऐयारों ने भी स्वप्न देखना आरम्भ किया, मगर भूतनाथ की आँखों में नींद का नाम-निशान भी न था और वह तमाम रात जागता ही रह गया।

जब रात घण्टे-भर से कुछ ज्यादे बाकी रह गयी, और सुबह को अठखेलियों के साथ चलकर खुशदिलों तथा नौजवानों के दिलों में गुदगुदी पैदा करनेवाली ठण्डी-ठण्डी हवा ने खुशबूदार जंगली फूलों और लताओं से हाथापाही करके उनकी सम्पत्ति छीनना और अपने को खुशबूदार बनाना शुरू कर दिया, तब इन्द्रदेव भी उस बारहदरी में आ पहुँचा, और सभों को गहरी नींद में सोते देख जगाने का उद्योग करने लगा। इस बारहदरी के आगे की तरफ एक छोटा-सा सहन था, जिसकी जमीन संगमूसा के स्याह और चौखटे पत्थरों से मढ़ी हुई थी। इस सहन के दाहिने और बायें कोनों पर दो-तीन आदमी बखूबी बैठ सकते थे। इन्द्रदेव दाहिने तरफवाले सिंहासन पर जाकर बैठ गया और उसके पावों को बारी-बारी से किसी हिसाब से घुमाने या उमेठने लगा। उसी समय सिंहासन के अन्दर से सरस और मधुर बाजे की आवाज आने लगी, और थोड़ी ही देर बाद गाने की आवाज भी पैदा हुई। मालूम होता था कि कई नौजवान औरतें बड़ी खूबी के साथ गा रही हैं, और कई आदमी पखावज, बीन, बंशी, मजीरा इत्यादि बजाकर उन्हें मदद पहुँचा रहे हैं। यह आवाज धीरे-धीरे बढ़ने और फैलने लगी, यहाँ तक की उस बारहदरी में सोनेवाले सभी लोगों को जगा दिया, अर्थात् सब कोई चौंककर उठ बैठे और ताज्जुब के साथ इधर-उधर देखने लगे। केवल इतने ही से बेचैनी दूर न हुई, और सब कोई बारहदरी से बाहर निकलकर सहन में चले आये, उस समय इन्द्रदेव ने सामने आकर महाराज को सलाम किया।

महाराज : यह तो मालूम हो गया कि यह सब तुम्हारी करीगरी का नतीजा है, मगर बताओ तो सही कि यह गाने-बजाने की आवाज कहाँ से आ रही है?

इन्द्रदेव : आइए, मैं बताता हूँ। महाराज को जगाने ही के लिए यह तरकीब की गयी थी, क्योंकि अब यहाँ से रवाना होने का समय हो गया है, और विलम्ब न करना चाहिए।

इतना कहकर इन्द्रदेव सभों को उस सिंहासन के पास ले गया, जिसमें से गाने की आवाज आ रही थी। और उसका असल भेद समझाकर बोला, ‘‘इसमें से मौके-मौके पर हर एक रागिनी पैदा हो सकती है।’’

इस अनूठे गाने-बजाने से महाराज बहुत प्रसन्न हुए और इसके बाद सभों को लिए हुए, इन्द्रदेव के मकान की तरफ रवाना हुए।

उस बारहदरी के बगल में ही एक कोठरी थी, जिसमें सभों को साथ लिए हुए इन्द्रदेव चला गया। इस समय इन्द्रदेव के पास भी तिलिस्मी खंजर था, जिससे उसने हल्की रोशनी पैदा की और उसी के सहारे सभों को लिये हुए आगे की तरफ बढ़ा।

उस कोठरी में जाने के बाद पहिले सभों को एक छोटे-से तहखाने में उतरना पड़ा। वहाँ सभों ने लाल रंग की एक समाधि देखी, जिसके बारे में दरियाफ्त करने पर इन्द्रदेव ने कहा कि यह समाधि नहीं है, सुरंग का दरवाजा है। इन्द्रदेव उस समाधि के पास बैठ गया और कोई ऐसी तरकीब की कि जिससे वह बीचोबीच से खुल गयी और नीचे उतरने के लिए चार-पाँच सीढ़ियाँ दिखायी दीं। इन्द्रदेव के कहे मुताबिक सब कोई नीचे उतर गये और इसके बाद सीधी सुरंग में चलने लगे। सुरंग की हालत ऊँची-नीची जमीन से साफ-साफ मालूम होता था कि वह पहाड़ काटकर बनायी हुई है, और सब लोग ऊँचे की तरफ बढ़ते जा रहे हैं। हमारे मुसाफिरों को दो-अढ़ाई घड़ी के लगभग चलना पड़ा और तब इन्द्रदेव ने ठहरने के लिए कहा, क्योंकि यहाँ सुरंग खतम हो चुकी थी और सामने एक बंद दरवाजा दिखायी दे रहा था। इन्द्रदेव ने ताली लगाकर ताला खोला और सभी को साथ लिये हुए, उसके अन्दर गया। सभों ने अपने को एक सुन्दर कमरे में पाया, और जब इस कमरे के बाहर हुए, तब मालूम हुआ कि सवेरा हो चुका है।

यह इन्द्रदेव का ही मकान है, जिसमें बुड्ढे दारोगा के साथ मदद पाने की उम्मीद में मायारानी गयी थी। इस सुन्दर और सुहावने स्थान का हाल हम पहिले लिख चुके हैं, इसलिए अब पुनः बयान करने की कोई जरूरत नहीं मालूम होती।

इन्द्रदेव सभी को लिये हुए अपने छोटे से बगीचे में गया, वहाँ चारों तरफ की सुन्दर छटा दिखायी दे रही थी, और खुशबूदार ठण्डी-ठण्डी हवा दिल और दिमाग के साथ दोस्ती का हक अदा कर रही थी।

महाराज सुरेन्द्रसिंह और बीरेन्द्रसिंह तथा दोनों कुमारों को यह स्थान बहुत पसन्द आया, और बार-बार इसकी तारीफ करने लगे। यद्यपि इस बगीचे में सभों के लायक दर्जे-बदर्जे कुर्सियाँ बिछी हुई थीं, मगर किसी का जी बैठने को नहीं चाहता था। सब कोई घूम-घूमकर यहाँ का आनन्द लेना चाहते थे और ले रहे थे, मगर इस बीच में एक ऐसा मामला हो गया, जिसने भूतनाथ और देवीसिंह दोनों ही को चौंका दिया। एक आदमी जल से भरा हुआ चाँदी का घड़ा और सोने की झारी लेकर आया और संगमरमर की चौकी पर जो बगीचे में पड़ी हुई थी, रखकर लौट चला। इसी आदमी को देखकर भूतनाथ और देवीसिंह चौंके थे, क्योंकि यह वही आदमी था, जिसे ये दोनों ऐयार नकाबपोशों के मकान में देख चुके थे। इसी आदमी ने नकाबपोशों के सामने एक तस्वीर पेश की थी और कहा था कि ‘कृपानाथ, बस मैं इसी का दावा भूतनाथ पर करूँगा’।* (* देखिए चन्द्रकान्ता सन्तति -5, बीसवाँ भाग, दूसरा बयान।)

केवल इतना ही नहीं, भूतनाथ ने वहाँ से थोड़ी दूर पर एक झाड़ी में अपनी स्त्री को भी फूल तोड़ते देखा और धीरे से देवीसिंह को छेड़कर कहा, ‘‘वह देखिए मेरी स्त्री भी वहाँ मौजूद है, ताज्जुब नहीं कि आपकी चम्पा भी कहीं घूम रही हो।’’

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